सुन्दर काण्ड दोहा (11)

 सुन्दर काण्ड दोहा 11 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा:

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।

मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।

शब्दार्थ:

जहँ तहँ – यहाँ-वहाँ

गईं सकल – सभी राक्षसियाँ चली गईं

कर मन सोच – मन में सोचने लगीं

मास दिवस बीतें – एक महीने की अवधि बीत जाए

मारिहि – मारेगा

निसिचर पोच – राक्षस नीच (रावण)

भावार्थ:

जब सभी राक्षसियाँ त्रिजटा के सपने को सत्य मानकर सीता को प्रणाम करके वहां से  चली गईं, तब सीता जी अकेली रह गईं और उनके मन में चिंता उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचा कि एक महीना पूरा हो जाने पर वह नीच राक्षस रावण मुझे अवश्य मार डालेगा।

विस्तृत विवेचन:

इस दोहे में माता सीता की मानसिक स्थिति को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है।

राक्षसियाँ तरह-तरह के भयानक रूप दिखाकर उन्हें डराती हैं और अंत में त्रिजटा के सपने को सत्य मानकर  वहाँ से चली जाती हैं। उनके जाने के बाद सीता जी का मन अत्यधिक विचलित और चिंताग्रस्त हो जाता है।

वे सोचती हैं कि रावण ने उन्हें एक महीने की समय-सीमा दी है, और यदि इस समय में उन्होंने उसकी बात नहीं मानी, तो वह उन्हें मार देगा। यह सीता जी की असहायता, पीड़ा और चिंता को दर्शाता है।

यह दोहा दिखाता है कि कैसे एक धर्मनिष्ठ और पतिव्रता नारी, विपत्तियों में भी अपने धर्म और मर्यादा से नहीं डिगती, लेकिन मन में स्वाभाविक रूप से भय और चिंता उत्पन्न होती है।

नैतिक सन्देश:

यह दोहा विपत्ति में धैर्य और धर्म का पालन करने की प्रेरणा देता है।

साथ ही, यह सीता जी के स्त्री-सुलभ भावनात्मक संघर्ष को उजागर करता है, जिससे पाठक उनके प्रति करुणा और सम्मान अनुभव करता है।

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