सुन्दर काण्ड दोहा (33)
सुन्दर काण्ड दोहा 33 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा
“ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।। ”
शब्दार्थ / भावार्थ
ता कहुँ = उसके लिए
कछु अगम नहिं = कुछ भी असंभव नहीं है
जा पर तुम्ह अनुकुल = जिस पर प्रभु की कृपा, अनुकूलता हो
तब प्रभावँ = तब उसके प्रभाव से
बड़वानलहिं = समुद्र में स्थित अग्नि
तूल = रुई
जारि सकइ = जला सकती है
खलु = निश्चय ही
👉 भावार्थ:
जिस जीव पर प्रभु श्रीराम की कृपा हो जाती है, उसके लिए संसार में कुछ भी कठिन या असंभव नहीं रहता। जैसे अग्नि रुई को सहज ही भस्म कर देती है, वैसे ही प्रभु की कृपा से भक्त सब प्रकार के दुष्कर कार्य आसानी से कर लेता है।
विस्तृत विवेचन
इस दोहे में हनुमान जी ने ईश्वर कृपा की महिमा का वर्णन किया है—
1. भगवद् कृपा से असंभव भी संभव:
भक्त चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, लेकिन जब भगवान उसकी ओर अनुकूल हो जाते हैं, तब उसके लिए कोई भी कार्य कठिन नहीं रहता। यह संसार का नियम है कि रुई अग्नि के संपर्क में आते ही तुरंत भस्म हो जाती है। उसी प्रकार प्रभु की कृपा के प्रभाव से सभी बाधाएँ स्वयं ही नष्ट हो जाती हैं।
2. हनुमानजी का उदाहरण:
इस समय संदर्भ हनुमानजी का है। उन्होंने समुद्र लाँघा, लंका दाह किया और असुरों को पराजित किया—ये सब उनके अपने सामर्थ्य से नहीं, बल्कि श्रीराम की कृपा से ही संभव हुआ। हनुमान जी यह स्पष्ट कर रहे हैं कि उनके पराक्रम का मूल कारण प्रभु का अनुग्रह है।
3. साधक के लिए शिक्षा:
मनुष्य के जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, यदि वह भगवान की शरण लेकर उनका भजन करता है तो सब कार्य सहज हो जाते हैं। प्रभु की कृपा से बड़े से बड़ा दुःख भी क्षणभर में समाप्त हो सकता है।
निष्कर्ष
यह दोहा हमें सिखाता है कि भक्त के जीवन में सबसे बड़ी शक्ति प्रभु की कृपा है।
संसार की कोई भी समस्या, बाधा या कठिनाई उनके लिए कठिन नहीं रह जाती जो भगवान को हृदय में धारण करते हैं और जिन पर उनका आशीर्वाद रहता है।
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