सुन्दर काण्ड चौपाई (263-270)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 263-270 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन करे:

चौपाई

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।

ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।

सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।

प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।

पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।

सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।

कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।

भावार्थ

जामवंत जी श्रीराम से कहते हैं—

“हे रघुनाथ! जिस पर आपकी कृपा हो जाती है, उसके ऊपर सदा शुभ, मंगल और कल्याण ही रहता है। देवता, मनुष्य और ऋषि-मुनि भी उस पर सदा प्रसन्न रहते हैं। वही सच्चा विजयी, विनयी और गुणों का भंडार है, जिसका यश तीनों लोकों में उज्ज्वल होता है। आपकी कृपा से ही आज सब काम सफल हो गया, और हमारा जीवन सार्थक बन गया।

हे प्रभु! पवनपुत्र हनुमान जी ने जो कार्य किया है, उसका वर्णन सहस्त्र मुखों से भी नहीं किया जा सकता। हनुमान जी के पवित्र और अद्भुत चरित्र को जामवंत जी ने आपके समक्ष सुनाया। उसे सुनकर करुणानिधान श्रीराम का मन अत्यंत प्रसन्न हुआ और वे हनुमान जी को हृदय से लगाकर हर्षित हुए। फिर उन्होंने प्रेमपूर्वक पूछा—“पुत्र! किस प्रकार जानकी जी वहाँ रह रही हैं और अपने प्राणों की रक्षा कर रही हैं?”

विस्तृत विवेचन

1. जामवंत की भक्ति और दृष्टि –

जामवंत जी यहाँ श्रीराम को यह स्मरण कराते हैं कि प्रभु की कृपा से ही कोई कार्य सिद्ध होता है। वे कहते हैं कि जिसके ऊपर राम का अनुग्रह हो जाए, उसके लिए असंभव कुछ भी नहीं रह जाता। यह श्रीराम की कृपा ही है कि हनुमान ने महासागर लाँघा, रावणपुरी में प्रवेश किया और सीता माता का पता लगाया।

2. हनुमान का महात्म्य –

जामवंत स्वीकार करते हैं कि हनुमान जी का कार्य इतना विलक्षण है कि उसका वर्णन असंख्य मुख भी नहीं कर सकते। हनुमान केवल बलवान ही नहीं, अपितु ज्ञान, विवेक, नीति, साहस और प्रभु-भक्ति के आदर्श हैं।

3. श्रीराम की प्रसन्नता –

जब श्रीराम ने हनुमान जी के पराक्रम और उनकी निष्ठा को सुना, तो वे हर्षित होकर उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। इससे यह शिक्षा मिलती है कि भगवान भक्तों के प्रेम और समर्पण से अत्यधिक प्रसन्न होते हैं, न कि उनके बाहरी वैभव से।

4. सीता माता की स्थिति –

श्रीराम का पहला प्रश्न यही रहा कि “सीता माता कैसी हैं? वे किस प्रकार रावण के बंदीगृह में रहकर अपने प्राणों की रक्षा कर रही हैं?” इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रभु के लिए सबसे बड़ी चिंता अपनी अर्धांगिनी, सती और पतिव्रता पत्नी की कुशल जानना था।


👉 निष्कर्ष –

यह चौपाई हमें यह संदेश देती है कि भगवान की कृपा से ही कार्य सिद्ध होते हैं, और जो सच्चा भक्त होता है, उसका यश तीनों लोकों में गाया जाता है। हनुमान जी की निष्ठा और सेवा-भावना का उदाहरण अद्वितीय है। श्रीराम का भक्त-प्रेम भी यहाँ झलकता है, क्योंकि वे हनुमान को हृदय से लगाते हैं और तुरंत सीता माता की कुशल पूछते हैं।


Comments

Popular posts from this blog

सुन्दर काण्ड (चौपाई 15-16)

सुन्दर काण्ड चौपाई ( 33-40)

सुन्दर काण्ड चौपाई (195-204)