सुन्दर काण्ड चौपाई (280-286)
सुन्दर काण्ड चौपाई 280-286 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
यह चौपाई वहां की है जहाँ श्रीराम, हनुमानजी को सीता जी के समाचार लाने के बाद अत्यन्त कृतज्ञ होकर अपना हृदय उँडेलते हैं। अब भावार्थ और विवेचन विस्तार से देखिए—
चौपाई
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
भावार्थ –
सीता जी के दुःख का समाचार सुनकर प्रभु श्रीराम, जो स्वयं सुख के सागर और आनंदस्वरूप हैं, उनकी कमल जैसी आँखें आँसुओं से भर गईं। वे कहते हैं—"हे हनुमान! मेरा मन, वाणी और कर्म सब सीता के चरणों में ही लगे रहते हैं, फिर भी उन्हें यह दुःख क्यों मिला? मुझे तो स्वप्न में भी नहीं समझ आता कि सीता जी को कैसी विपत्ति आ पड़ी।"
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
भावार्थ –
हनुमानजी विनम्रता से कहते हैं—"प्रभु! जीव के जीवन में वही विपत्ति है जब वह आपके स्मरण और भजन से विमुख हो जाए। जो आपके नाम का आश्रय छोड़ दे, वही सच्ची विपत्ति है।"
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
भावार्थ –
"राक्षसों की क्या बात करनी? उन्हें तो आप सहज ही जीत लेंगे और सीता जी को शीघ्र ही वापस ले आएँगे।"
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
भावार्थ –
श्रीराम कहते हैं—"हे कपि! तेरे समान उपकारी न तो कोई देव है, न मनुष्य, न मुनि। मैं तेरे उपकार का बदला कैसे चुका सकता हूँ? मेरा मन तो तेरे सम्मुख रहकर भी कुछ नहीं कर पाता।"
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
भावार्थ –
"हे पुत्रवत प्रिय हनुमान! मैंने मन में गहराई से विचार किया है—मैं तेरे उपकार से कभी उऋण नहीं हो सकता।"
विस्तृत विवेचन
1. प्रभु की करुणा – यह प्रसंग दिखाता है कि भगवान राम केवल विष्णु का अवतार नहीं, बल्कि करुणा और प्रेम का मूर्त रूप हैं। स्वयं आनंदस्वरूप होने पर भी वे अपनी पत्नी की पीड़ा सुनकर रो उठते हैं। यह उनका मानवोचित भाव है, जो भक्त को और भी अधिक निकटता देता है।
2. हनुमान की भक्ति की परिभाषा – हनुमानजी विपत्ति की असली परिभाषा बताते हैं—धन-हानि, रोग, कष्ट आदि सच्ची विपत्ति नहीं है, बल्कि प्रभु-भजन से विमुख होना ही वास्तविक संकट है। इससे भक्तिरस का सर्वोच्च आदर्श झलकता है।
3. राम का कृतज्ञ भाव – श्रीराम स्वयं भगवान होकर भी हनुमान के उपकार को स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि "तेरे उपकार से मैं उऋण नहीं हो सकता।" इससे भक्ति और सेवा का महत्व स्पष्ट होता है।
4. भक्ति की चरम सीमा – यह प्रसंग सिद्ध करता है कि भगवान स्वयं भी भक्त के प्रेम और सेवा के आगे ऋणी हो जाते हैं। इसी कारण तुलसीदासजी ने लिखा – "भक्तिहीन नर सो मोहि न भावै।"
👉 निष्कर्ष –
यह चौपाई हमें सिखाती है कि सच्ची विपत्ति केवल प्रभु-भजन का अभाव है, और सच्ची महिमा भक्त की सेवा में है। हनुमान जैसे सेवक को स्वयं भगवान भी ऋणी मानते हैं।
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