सुन्दर काण्ड दोहा (30)
सुन्दर काण्ड दोहा 30 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा (30):
"नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।"
यह दोहा उस समय का है जब भगवान राम ने हनुमान से सीता माता की कुशलता के बारे में पूछा, तब हनुमान जी ने उसका उत्तर दिया:-
शाब्दिक अर्थ
नाम पाहरु = प्रभु का नाम ही सीता माता के लिए दिन-रात का कवच है।
दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट = दिन-रात राम का ध्यान सीता माता के हृदय के द्वार पर ताले के समान लगा हुआ है।
लोचन निज पद जंत्रित = सीता माता की आँखें राम के चरणों पर बँधी हुई हैं।
जाहिं प्रान केहिं बाट = ऐसे में उनके प्राण और मन किसी अन्य मार्ग की ओर जा ही नहीं सकते।
भावार्थ
इस दोहे में सीता माता की भगवान् के प्रति अनन्य भक्ति को प्रकट किया गया है। भक्त कहता है कि—
सीता माता अपने जीवन को प्रभु के नाम-जप रूपी कवच से सुरक्षित कर लिया है।
दिन-रात उनके हृदय के द्वार पर राम का ध्यान रूपी ताले लगे रहते हैं।
उनकी आँखें राम के चरणों में ही स्थिर हो चुकी हैं।
इसलिए उनके प्राण अब किसी अन्य विषय या मोह की ओर कभी जा ही नहीं सकते।
यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि जिस भक्त का मन, वाणी और दृष्टि सब प्रभु में लग जाती है, उसके लिए संसार के मायिक बंधन निष्प्रभावी हो जाते हैं।
विस्तृत विवेचन
1. नाम-जप की महिमा – तुलसीदास जी ने बताया कि ‘राम नाम’ सबसे बड़ा रक्षा कवच है। यह कवच दिन-रात साधक की रक्षा करता है, जैसे कोई सैनिक पहरेदार करके सुरक्षा करता है।
2. ध्यान की साधना – जब हृदय के कपाट पर प्रभु का ध्यान टिका हो तो बाहरी विकार या प्रलोभन भीतर प्रवेश नहीं कर पाते।
3. भक्ति में दृष्टि स्थिरता – आँखों का आकर्षण सामान्यतः सांसारिक विषयों की ओर खिंचता है, परंतु जब वे प्रभु के चरणों पर बंध जाते हैं तो चंचलता मिट जाती है।
4. प्राणों की दिशा – प्राण और मन उसी ओर जाते हैं जहाँ हमारी आसक्ति होती है। यहाँ सीता माता की आसक्ति केवल प्रभु में है, इसलिए संसार के मोह-माया का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
👉 निष्कर्षतः, यह दोहा हमें सिखाता है कि नाम-स्मरण, ध्यान और चरणों में मन की स्थिरता से भक्त संसार के बंधनों से मुक्त होकर परम शांति और सुरक्षा प्राप्त करता है।
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