सुन्दर काण्ड दोहा (43)

 सुन्दर काण्ड दोहा 43 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।

भावार्थ

जो लोग किसी शरणागत (शरण लेने वाले) को यह सोचकर त्याग देते हैं कि यह हमारे लिए अनिष्टकारी होगा, वे मनुष्य पाप से भरे हुए नीच कहलाते हैं। ऐसे लोगों की ओर देखना भी हानिकारक है।

विस्तृत विवेचन

यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान राम की शरणागत वत्सलता (शरण लेने वाले की रक्षा करना) का महत्व बताया है।

1. शरणागत की रक्षा का धर्म – भारतीय संस्कृति में यह सिद्धांत है कि जो शरण में आ जाए, उसका रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म है, चाहे वह मित्र हो या शत्रु। श्रीराम ने स्वयं विभीषण को शरण दी, भले ही वे रावण के भाई थे।

2. त्याग करने वालों की निंदा – जो लोग अपने स्वार्थ और भयवश शरणागत का त्याग करते हैं, वे वास्तव में अधम और पापमय कहलाते हैं। ऐसे व्यक्तियों का संग और दर्शन तक अहितकारी माना गया है, क्योंकि वे धर्मविहीन होते हैं

3. राम का आदर्श – श्रीराम ने यह शिक्षा दी कि सच्चा धर्म वही है, जिसमें शरणागत की रक्षा हो। उनका यह चरित्र मानव समाज को करुणा, क्षमा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

✅ निष्कर्ष – इस दोहे के माध्यम से तुलसीदास जी बताते हैं कि शरणागत का त्याग सबसे बड़ा पाप है। जो ऐसा करता है, वह नीच और पापी है, और ऐसे व्यक्तियों से दूर रहना ही कल्याणकारी है।

Comments

Popular posts from this blog

सुन्दर काण्ड (चौपाई 15-16)

सुन्दर काण्ड चौपाई ( 33-40)

सुन्दर काण्ड चौपाई (195-204)