सुन्दर काण्ड चौपाई (272-280)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 272-280 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।

कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।

ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।

जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।

 यह चौपाई सुन्दर काण्ड की है, जिसमें विभीषण का भगवान राम की शरण में आना और सुग्रीव का संदेह प्रकट करना वर्णित है।

चौपाई

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।

कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।

ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।

जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।

भावार्थ

विभीषण ने बहुत सोच-विचार कर, प्रेमपूर्वक यह निश्चय किया कि अब रावण का साथ छोड़कर भगवान राम की शरण लेनी चाहिए। वे समुद्र पार करके राम जी की ओर चले आए।

वानरों ने विभीषण को आते देखा तो उन्हें संदेह हुआ कि शायद यह शत्रु का दूत हो। उन्होंने सुग्रीव को इसकी सूचना दी।

सुग्रीव ने राम जी से कहा – “हे रघुनाथ! रावण का भाई मिलने आया है।”

भगवान राम ने पूछा – “सखा, अब क्या करना चाहिए?”

सुग्रीव ने कहा – “हे नरश्रेष्ठ! राक्षसों की माया को कोई नहीं जान सकता। यह न जाने किस कारण आया है। शायद हमारा भेद लेने आया हो, इसलिए इसे बाँधकर रखना उचित है।”

तब श्रीराम ने कहा – “सखा! तुम्हारी नीति-युक्त बातें उचित हैं, लेकिन मेरा व्रत है कि जो भी शरणागत हो, उसे मैं अवश्य स्वीकार करता हूँ।”

भगवान के इस वचन को सुनकर हनुमान बहुत प्रसन्न हुए और मन ही मन भगवान को ‘शरणागतवत्सल’ मानकर उनका गुणगान करने लगे।

विस्तृत विवेचन

1. विभीषण का आगमन – विभीषण एक धर्मात्मा और नीति-प्रिय व्यक्ति थे। जब रावण ने उनकी कोई बात न मानी तो उन्होंने राम जी की शरण में जाने का निश्चय किया। यह उनके विवेक और धर्मपरायणता का परिचायक है।

2. सुग्रीव का संशय – सुग्रीव ने राज्य की सुरक्षा और नीति के अनुसार संशय प्रकट किया। उसका कहना था कि शत्रु की माया अथाह है, इसलिए सावधानी आवश्यक है। यहाँ सुग्रीव के व्यावहारिक और राजनीतिक दृष्टिकोण का चित्रण है।

3. राम का निर्णय – राम जी ने नीति को स्वीकारते हुए भी अपने धर्म का पालन किया। उन्होंने कहा कि जो भी मेरी शरण में आएगा, मैं उसे स्वीकार करूंगा। यही उनके “शरणागतवत्सल” स्वरूप की महिमा है।

4. हनुमान का हर्ष – हनुमान जी राम जी के इस उदार और करुणामय निर्णय को सुनकर हर्षित हुए, क्योंकि वे जानते थे कि प्रभु दीनों और शरणागतों के रक्षक हैं।

👉 इस प्रकार, इस प्रसंग में राम के करुणा, शरणागत की रक्षा के संकल्प, सुग्रीव की सावधानीपूर्ण नीति और विभीषण के धर्मनिष्ठ विवेक – इन तीनों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

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