सुन्दर काण्ड चौपाई (348-354)
सुन्दर काण्ड चौपाई 348-354 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
भावार्थ
माल्यवंत, जो रावण के प्राचीन और बुद्धिमान मंत्री थे, उन्होंने नीति और धर्म की दृष्टि से रावण को उत्तम परामर्श दिया, जिसे सुनकर रावण ने बाहर से तो प्रसन्नता प्रकट की, पर मन में अहंकारवश स्वीकार नहीं किया।
बिभीषण ने भी पुनः हाथ जोड़कर समझाया कि पुराण और शास्त्र कहते हैं—हर व्यक्ति के हृदय में सुमति (सद्बुद्धि) और कुमति (दुर्बुद्धि) दोनों रहती हैं। जहाँ सुमति रहती है, वहाँ सुख-समृद्धि आती है; और जहाँ कुमति का वास होता है, वहाँ विनाश और संकट का नाश होता है।
लेकिन हे रावण! तेरे हृदय में विपरीत कुमति ही बैठ गई है, इसलिए तू हित-अनहित का भेद नहीं समझ पा रहा है, बल्कि शत्रु की बात को ही प्रिय मानता है। यही कारण है कि तू अपने कुल का नाश करने वाली "कालरात्रि" समान सीता पर मोहवश आसक्त हुआ है।
विस्तृत विवेचन
1. माल्यवंत का उपदेश –
माल्यवंत बहुत सयाने और नीति-निपुण मंत्री थे। उन्होंने रावण को समझाया कि बिभीषण जैसा भाई सच्चा हितैषी है। उसका कथन नीति और धर्म से युक्त है, अतः उसे हृदय में धारण करना चाहिए। लेकिन रावण का अहंकार इतना प्रबल था कि उसने विपरीत ही ग्रहण किया।
2. सुमति और कुमति का अंतर –
तुलसीदास जी बताते हैं कि हर जीव में दो प्रवृत्तियाँ साथ रहती हैं। सुमति हमें धर्म, सत्य, और भलाई की ओर ले जाती है, जिससे समृद्धि और सुख मिलता है। वहीं कुमति हमें अधर्म, लोभ, क्रोध और मोह की ओर धकेल देती है, जिससे दुख और विनाश की प्राप्ति होती है। रावण ने सुमति को त्यागकर कुमति को अपना लिया।
3. रावण की स्थिति –
रावण की बुद्धि विपरीत हो चुकी थी। उसे अपने हित-अहित का ज्ञान नहीं रहा। उसने सच्चे शुभचिंतकों (माल्यवंत और बिभीषण) की बात को अनसुना कर दिया और शत्रु-समान नीति (मंदोदरी और अन्य निकृष्ट सलाहकारों की बात) को ही मान लिया। यही उसके पतन का कारण बना।
4. सीता पर मोह –
तुलसीदास जी यहाँ गहराई से संकेत करते हैं कि रावण का सीता पर मोह ही उसके वंश के लिए कालरात्रि सिद्ध हुआ। यह मोह ही उसके अहंकार और कुमति का प्रमाण था, जिसने पूरे राक्षसकुल को विनाश की ओर धकेल दिया।
✅ सार
यह चौपाई हमें यह शिक्षा देती है कि—
सच्चे शुभचिंतकों की बात को सुनकर अपनाना चाहिए, चाहे वह कड़वी क्यों न लगे।
सुमति (सद्बुद्धि) ही जीवन में सुख-संपत्ति लाती है, और कुमति (दुर्बुद्धि) ही सभी दुखों और विनाश का कारण बनती है।
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