सुन्दर काण्ड दोहा (40)
सुन्दर काण्ड दोहा 40 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।
भावार्थ
हे भाई (रावण)! मैं आपके चरण पकड़कर विनती करता हूँ। आप माता सीता को श्रीराम को लौटा दें। इससे आपका कोई अहित नहीं होगा, बल्कि कल्याण ही होगा।
विस्तृत विवेचन
यह दोहा सुन्दरकाण्ड में उस समय का है जब विभीषण ने रावण को नीति और धर्म का उपदेश दिया।
1. विभीषण की विनम्रता और भाईचारा
विभीषण ने रावण को क्रोध या कठोरता से नहीं, बल्कि अत्यंत विनम्र और भाईचारे से समझाने का प्रयास किया।
उन्होंने "तात" (पिता समान भाई) कहकर रावण को सम्बोधित किया और चरण पकड़कर दुलार से बात कही।
इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्म की बात भी जब कोमलता से कही जाती है तो उसका प्रभाव गहरा होता है।
2. सीता-हरण के दुष्परिणाम से बचाव
विभीषण ने कहा कि यदि आप सीता जी को रामचंद्रजी को लौटा दें तो इससे आपका कोई नुकसान नहीं होगा।
बल्कि राम जी की कृपा प्राप्त होगी और आपके कुल, राज्य और प्राण सब सुरक्षित रहेंगे।
यदि ऐसा न किया गया तो अनर्थ निश्चित है क्योंकि भगवान श्रीराम के विरुद्ध चलना मृत्यु के मुख में जाने जैसा है।
3. नीति और धर्म का संदेश
यह दोहा नीति का अत्यंत सुंदर उदाहरण है।
जब किसी को समझाना हो तो पहले उसके अहंकार को तोड़े बिना प्रेमपूर्वक और हितकारी भाव से कहना चाहिए।
विभीषण यह दिखा रहे हैं कि धर्मपालन से ही कल्याण संभव है, अधर्म का मार्ग अंततः विनाश ही लाता है।
👉 संक्षेप में, इस दोहे में विभीषण की विनम्र नीति, भाईचारे की भावना और धर्म की महिमा प्रकट होती है। वह यह समझा रहे हैं कि श्रीराम का विरोध करना अहितकारी है, जबकि सीता
जी को लौटा देने में ही रावण और उसके कुल का कल्याण है।
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