सुन्दर काण्ड चौपाई (271-279)
सुन्दर काण्ड चौपाई 271-279 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
यह चौपाई उस समय का है जब हनुमान जी भगवान राम को सीता माता का संदेश सुनाते हैं:
चौपाई
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
👉 भावार्थ –
सीता जी ने जाते समय हनुमान जी को अपना चूड़ामणि दिया और कहा कि इसे राम जी को दे देना। यह मेरा विश्वास-चिह्न है। फिर सीता जी ने अश्रुपूरित नेत्रों से कुछ वचन कहे।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
👉 भावार्थ –
हे प्रभु! आप छोटे भाई लक्ष्मण समेत अपने चरणों में मुझे स्वीकार कीजिए। आप शरणागत का पालन करने वाले, दीनबन्धु और दुःख हरने वाले हैं। मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों में अनुरक्त हूँ, तो हे नाथ! किस अपराध के कारण आपने मुझे त्याग दिया है?
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
👉 भावार्थ –
मैं अपना एक ही दोष मानती हूँ कि आपके बिछड़ने पर मैंने अपने प्राण नहीं त्यागे। परन्तु इसमें भी मेरी आँखों का अपराध है। यदि आँखें रोकर प्राण को रोक न लेतीं तो बिछोह की वेदना में प्राण बहुत पहले निकल जाते।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।।
👉 भावार्थ –
बिछोह की अग्नि और तनु रूपी रूई, दोनों को स्वास रूपी पवन क्षणभर में भस्म कर डालते। परंतु नेत्र अपने ही हित के लिए निरंतर आँसुओं का जल बहाते हैं, जिससे यह शरीर जलकर भी समाप्त नहीं होता।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
👉 भावार्थ –
हे दीनदयालु राम! सीता की यह अत्यन्त विपत्ति बिना कहे भी आपको भलीभाँति ज्ञात है।
विस्तृत विवेचन
1. चूड़ामणि का प्रतीकात्मक महत्व –
सीता जी द्वारा दिया गया चूड़ामणि श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है। जैसे कोई स्त्री अपना सबसे प्रिय आभूषण पति के लिए सुरक्षित रखती है, वैसे ही यह संदेश राम जी को सीता जी की अटूट निष्ठा का प्रमाण देता है।
2. सीता का दर्द और भक्ति –
इन चौपाइयों में सीता जी का विरह-शोक और अटल विश्वास दोनों झलकते हैं। वे स्वयं को दोष देती हैं कि राम जी के बिना जीवित रहना ही अपराध है, परंतु आँसू उनके प्राणों को निकलने नहीं देते। यह विरह की चरम पीड़ा का दार्शनिक चित्रण है।
3. राम पर भरोसा –
सीता जी जानती हैं कि राम दीनदयालु और शरणागत के रक्षक हैं। इसलिए वे हनुमान जी के माध्यम से संदेश भेजते हुए आश्वस्त हैं कि प्रभु अवश्य उन्हें इस विपत्ति से मुक्त करेंगे।
✨ निष्कर्ष –
यह चौपाई सीता जी की गहन वेदना, पतिव्रता धर्म और राम-भक्ति का अप्रतिम उदाहरण है। इसमें विरह-पीड़ा की करुणा और प्रभु पर विश्वास की गहराई दोनों अद्भुत रूप से व्यक्त हुई हैं।
Comments
Post a Comment