सुन्दर काण्ड दोहा (31)
सुन्दर काण्ड दोहा 31 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।
यह दोहा उस समय का है जब हनुमान जी राम जी को सीता माता। का संदेश सुनाते हैं और कहते हैं:
पद-विश्लेषण
निमिष निमिष: पलक झपकने जितना छोटा क्षण, एक-एक पल
करुणानिधि: करुणा के महासागर—श्रीराम
कल्प सम बीति: कल्प (अत्यन्त दीर्घ काल) के समान बीत रहा है
बेगि चलिय: शीघ्र चलिए (हनुमान जी का निवेदन)
प्रभु आनिअ: प्रभु (राम) ले आइए
भुज बल: भुजाओं का पराक्रम—शौर्य
खल दल: दुष्टों की सेना—रावण और राक्षस
जीति: जीतकर, पराजित करके
भावार्थ
हे करुणामय राम! आपके विरह में सीता माता का प्रत्येक क्षण अनन्त काल जैसा लग रहा है। आप शीघ्र चलिए और अपनी भुजाओं के बल से उन दुष्टों की सेना को परास्त कर सीता माता का उद्धार करें।
विस्तृत विवेचन
1. विरह की तीव्रता व समय-अनुभूति: “निमिष निमिष… कल्प सम” उपमा से सीता जी का दुःख चरम पर दिखता है—प्रेम में समय का अनुभव बदल जाता है; पलकभर भी युग समान लगता है। यह विप्रलंभ शृंगार और करुण रस का अद्भुत संयोग है।
2. आस्था + कार्य-आग्रह: “बेगि चलिय” में रामजी से तत्परता का निवेदन है, और “भुज बल खल दल जीति” में राम-पराक्रम पर अटूट विश्वास—अर्थात धर्म की विजय निश्चित है; बस शीघ्र आगमन हो।
काव्य-सौंदर्य व अलंकार
उपमा: “निमिष… कल्प सम”—क्षण की तुलना कल्प से
अनुप्रास: “भुज बल खल दल” में ध्वन्यात्मक सौंदर्य
संक्षिप्तता में व्यापकता: छोटे से दोहे में विरह, भक्ति, पराक्रम और धर्म-विजय—सब एक साथ समाए हैं।
संदेश/सीख
प्रेम-भक्ति का स्वरूप: सच्ची भक्ति में विरह भी साधना बन जाता है, पर आस्था डगमगाती नहीं।
धर्म की निश्चयात्मक विजय: अधर्म प्रबल दिखे, फिर भी “भुज बल” (पुरुषार्थ + कृपा) से उसकी पराजय सुनिश्चित है।
संक्षेप में, यह दोहा सीता जी के विरह-वेदना और राम-पराक्रम में अटूट विश्वास—दोनों का हृदयस्पर्शी घोष है: “हर पल युग-सा लग रहा है; प्रभु जल्दी चलिए और दुष्टों का दल जीतकर धर्म की प्रतिष्ठा करिये।”
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