सुन्दर काण्ड दोहा (35)

 सुन्दर काण्ड दोहा 35 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा

"एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।

जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।३५।।"

भावार्थ

इस प्रकार श्रीराम कृपानिधान अपनी वानर–भालु सेना सहित समुद्र तट पर पहुँचे। वहाँ पहुँचे हुए असंख्य वानर और भालु इधर-उधर फलों को खाने लगे और जहाँ-तहाँ विचरण करने लगे।

विस्तृत विवेचन

1. रामजी का सागर तट पर आगमन –

लंका विजय की तैयारी हेतु भगवान राम, लक्ष्मण और पूरी वानर-भालु सेना समुद्र के किनारे पहुँचे। यह स्थल ही आगे चलकर रामसेतु निर्माण का केंद्र बना। "कृपानिधि" कहकर तुलसीदासजी ने यह संकेत किया कि प्रभु राम केवल करुणा और दया के भंडार हैं, वे शरणागत वत्सल हैं।

2. सेना का स्वभाव –

वानर और भालु विशाल संख्या में समुद्र तट पर पहुँचते ही प्राकृतिक वृत्ति के अनुसार फलों को खाने और यहाँ–वहाँ घूमने लगे। यह चित्रण उनके सहज, सरल और चंचल स्वभाव को दर्शाता है। लेकिन यही वानर आगे चलकर प्रभु के आदेश पर सेतु निर्माण और युद्ध जैसे कठिन कार्यों को भी करते हैं।

3. गूढ़ संकेत –

रामकथा यह दिखाती है कि साधारण-से लगने वाले प्राणी जब प्रभु की सेवा में लगते हैं तो असाधारण कार्य कर डालते हैं। यहाँ "जहाँ-तहाँ खान फल" केवल भूख मिटाने का चित्रण नहीं, बल्कि यह भी संकेत है कि जीव चाहे कितना भी सामान्य क्यों न हो, प्रभु की कृपा से महान कार्य कर सकता है।

👉 सार यह है कि यह दोहा रामसेतु निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार करता है और बताता है कि प्रभु की सेना समुद्र तट पर पहुँच चुकी थी, जहाँ से लंका विजय की शुरुआत होती है।

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