सुन्दर काण्ड चौपाई (332-339)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 332-339 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन :

चौपाई:

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।

अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।

जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।

सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।

चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।

गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।

भावार्थ

जब रावण दरबार में बैठा था, तो उसके मंत्री उसकी प्रसंशा कर रहे थे। उसी समय अवसर पाकर विभीषण, अपने भाई रावण के चरणों में सिर झुकाकर विनम्रता से बैठ गया। उसने आज्ञा पाकर नीति और धर्म की बातें कहते हुए समझाया –

हे कृपालु भ्राता! यदि आप मुझसे कुछ पूछते हैं, तो मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की ही बात कहूँगा।

जो अपना कल्याण, यश, सद्बुद्धि, उत्तम गति और सुख चाहते हैं, वे पराई स्त्री को अपनी ललाट पर सुशोभित चंद्रमा की तरह त्याग देते हैं।

चौदहों लोकों पर भले ही कोई एकमात्र स्वामी हो, किंतु जो दूसरों की स्त्री का अपमान करता है, वह कहीं भी सुख से नहीं रह सकता।

गुणों का भंडार और नगर का श्रेष्ठ व्यक्ति भी यदि थोड़े से लोभ में पड़ जाए तो किसी से भली बात नहीं कह पाता।

विस्तृत विवेचन

1. विभीषण का धर्मोपदेश –

इस प्रसंग में विभीषण रावण को नीति का उपदेश देता है। वह कहता है कि पराई स्त्री का अपमान करना सबसे बड़ा पाप है। जैसे चतुर्थी का चंद्रमा दोषयुक्त होता है, वैसे ही परस्त्री संगति भी कलंक का कारण बनती है।

2. सच्चा हितैषी कौन? –

जो व्यक्ति सामने से मीठी बातें कर केवल प्रसंशा करे, वह सच्चा हितैषी नहीं होता। विभीषण ने निडर होकर अपने भाई को धर्म और नीति का स्मरण कराया। यही सच्चे भाई और सच्चे मित्र की पहचान है।

3. धर्म और नीति की शिक्षा –

तुलसीदास जी यहाँ यह संदेश देते हैं कि परस्त्री–गमन नाशकारी है। चाहे व्यक्ति कितना ही बड़ा राजा क्यों न हो, यदि वह स्त्रियों के सम्मान की रक्षा नहीं करता, तो उसका राज्य और यश शीघ्र नष्ट हो जाता है।

4. विभीषण का विवेक –

विभीषण जानता था कि रावण अत्यंत बलशाली है, लेकिन फिर भी उसने धर्म और सत्य की रक्षा के लिए निडर होकर उसे उपदेश दिया। यह उसका बड़ा गुण है, और आगे चलकर यही विभीषण को धर्मपक्ष में ले आता है।

👉 सार –

इस चौपाई में विभीषण ने रावण को चेताया कि यदि वह अपना कल्याण और यश चाहता है, तो उसे माता सीता का त्याग करना ही होगा। परस्त्री का अपमान व्यक्ति को चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो, अंततः विनाश की ओर ले जाता है।

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