सुन्दर काण्ड चौपाई (364-371)
सुन्दर काण्ड चौपाई 364-371 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन करे:
चौपाई
"अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिह
उँ तेई।।"
भावार्थ
जब विभीषण ने उचित नीति कहकर रावण को समझाया और वह उनकी बात न मानकर उन्हें अपमानित कर निकाल दिया, तब विभीषण वहाँ से श्रीराम की शरण में जाने के लिए प्रसन्न होकर चल पड़े।
साधु की अवज्ञा होते ही दुष्ट का सर्वनाश निश्चित हो जाता है। रावण ने जब विभीषण को त्याग दिया, तभी उसका ऐश्वर्य, वैभव और आयु सब क्षीण हो गया।
विभीषण मन ही मन हर्षित होकर यह सोचने लगे कि अब मुझे प्रभु श्रीराम के चरण-कमल देखने और उनकी सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। यही चरण हैं जिन्होंने ऋषि-पत्नी अहल्या को तार दिया, दण्डकवन को पवित्र किया, सीता जी को हृदय से लगाकर कपट-मृग का पीछा किया और जिन चरणों को स्वयं भगवान शंकर अपने हृदय में धारण करते हैं। ऐसे पावन चरणों का दर्शन करना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य होगा।
विस्तृत विवेचन
1. साधु-अवज्ञा और रावण का पतन
तुलसीदास जी कहते हैं कि जब विभीषण ने धर्म और नीति की बातें कहीं, रावण ने उसे अपमानित कर भगा दिया। संतों की अवज्ञा और तिरस्कार करते ही व्यक्ति का पतन निश्चित हो जाता है। इसीलिए रावण के त्यागते ही उसका वैभव और आयु दोनों घट गए।
2. विभीषण की श्रीराम शरणागति
विभीषण जब रावण से अलग होकर श्रीराम की शरण की ओर चले, तो उनके मन में अत्यंत प्रसन्नता थी। वे सोचते हैं कि अब मुझे प्रभु राम के पावन चरणों का दर्शन मिलेगा। तुलसीदास जी यहाँ रामचरण की महिमा गिनाते हैं—
जिन चरणों से अहल्या का उद्धार हुआ।
जिनके स्पर्श से दण्डकवन पवित्र हुआ।
जिन्होंने माता सीता को हृदय से लगाया और कपटी मृग का पीछा किया।
जिन्हें स्वयं भगवान शंकर अपने हृदय में धारण करते हैं।
इस प्रकार विभीषण अपने को परम भाग्यशाली मानते हैं।
सार
इस चौपाई का सार यह है कि संत और सज्जनों की अवमानना करने से व्यक्ति का विनाश हो जाता है। रावण ने विभीषण को अपमानित करके अपने विनाश को बुला लिया। वहीं विभीषण के जीवन में श्रीराम के चरणों की सेवा और दर्शन का महान सौभाग्य प्राप्त हुआ। यही नीति है— "साधु त्याग करिहि जो कोई, नरक निकट सो जानिहि सोई।"
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