सुन्दर काण्ड दोहा (36)

 सुन्दर काण्ड दोहा 36 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन 

दोहा

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।

जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।

भावार्थ

श्रीराम के बाण सर्पों के समान हैं और राक्षसों की विशाल सेना मेंढकों के समान है। जैसे ही सर्प मेंढकों को पकड़कर निगलना शुरू करता है, वैसे ही रामबाण राक्षसों को ग्रसते हैं। जब तक सर्प उन्हें पकड़कर खाता नहीं, तब तक मेंढक टर्र-टर्र करते रहते हैं, परंतु एक बार निगल लिए जाने पर उनका कोई उपाय काम नहीं आता। उसी प्रकार राक्षसों को चाहिए कि वे श्रीराम के विरोध का आश्रय छोड़कर जल्दी ही उनके चरणों की शरण ग्रहण करें, अन्यथा रामबाण उन्हें नष्ट कर देंगे।

विस्तृत विवेचन

1. रामबाण की महिमा –

तुलसीदासजी ने यहाँ रामबाण की तुलना विषधर सर्प से की है। रामबाण जैसे अचूक और प्रचंड अस्त्र राक्षसों का संहार वैसे ही करते हैं, जैसे सर्प सामने आते ही मेंढकों को निगल लेता है।

2. राक्षसों की स्थिति –

राक्षसों को ‘भेक’ (मेंढक) कहा गया है। मेंढक तालाब में रहते हुए शोर तो बहुत करते हैं, परंतु सर्प के सम्मुख आते ही उनकी बोलती बंद हो जाती है। इसी प्रकार रावण की सेना शोर-शराबा और घमंड तो करती है, लेकिन रामबाण के सामने उनका अस्तित्व टिक नहीं सकता।

3. शरणागति का संदेश –

तुलसीदासजी यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जो राम का विरोध करेगा, वह नष्ट हो जाएगा। परंतु जो उनके चरणों में शरण लेगा, वह सदा सुरक्षित रहेगा। इसलिए राक्षसों को व्यर्थ का पराक्रम दिखाकर युद्ध नहीं करना चाहिए, बल्कि प्रभु की शरण ग्रहण करनी चाहिए।

4. आध्यात्मिक संकेत –

यह दोहा केवल राक्षस-वध का वर्णन नहीं करता, बल्कि एक गहरा उपदेश भी देता है। हमारे भीतर की आसुरी वृत्तियाँ (काम, क्रोध, लोभ, अहंकार) वे ‘मेंढक’ हैं। और प्रभु का नाम तथा उनके बाण (सत्संग, भक्ति, सद्गुण) वे ‘सर्प’ हैं, जो इन आसुरी वृत्तियों को नष्ट कर देते हैं।

👉 निष्कर्ष –

इस दोहे में तुलसीदासजी ने उपमा के माध्यम से यह बताया है कि रामबाण के सामने राक्षस सेना का कोई अस्तित्व नहीं है। अतः सच्चा मार्ग है प्रभु की शरण ग्रहण करना और भक्ति करना, तभी जीवन सुरक्षित व सफल हो सकता है।

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