सुन्दर काण्ड चौपाई (304-312)
सुन्दर काण्ड चौपाई 304-312 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड की है, जहाँ श्रीराम की कृपा से वानर-भालुओं की अपार शक्ति प्रकट होती है और युद्ध-यात्रा के लिए उनका प्रस्थान होता है।
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ
१. "प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।"
वानर और भालु, जिनकी शक्ति अपार है, वे सिर झुकाकर प्रभु श्रीराम के चरणकमलों को प्रणाम करते हैं और गरजते हुए उत्साह प्रकट करते हैं।
२. "देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।"
श्रीराम ने सम्पूर्ण वानर-सेना को देखा और अपने कमलनयन से उन पर असीम कृपा की।
३. "राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।"
श्रीराम की कृपा-शक्ति पाकर वानरराज सुग्रीव तथा पूरी सेना ऐसे बलवान हो गए मानो गिरीराज पर्वत ही चल पड़े हों।
४. "हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।"
रामजी प्रसन्न होकर प्रस्थान करते हैं, और उस समय अनेक मंगलकारी शुभ शकुन होने लगे।
५. "जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।"
जिसका समस्त कार्य ही मंगलमय है (श्रीराम), उनके पथ पर शुभ शकुन होना तो स्वाभाविक ही है।
६. "प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।"
सीता माता ने (लंका में रहते हुए भी) प्रभु का पथ-प्रस्थान जान लिया। उनके शरीर का बायाँ अंग फड़कने लगा, जो शुभ संकेत था।
७. "जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।"
जो-जो शुभ शकुन माता सीता को हो रहे थे, वे ही अशुभ शकुन रावण को होने लगे।
८. "चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।"
उस वानर-भालु सेना का वर्णन करना असंभव है, जो अत्यधिक बल से गर्जना करती हुई चली।
९. "नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।"
कोई अपने नखों को ही शस्त्र बनाकर, कोई पर्वत और वृक्ष उठाकर, इच्छानुसार आकाश और भूमि पर दौड़ते-फिरते जा रहे थे।
१०. "केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।"
वानर-भालु सिंहनाद करते हुए चले, जिससे दिग्गज (दिशाओं के हाथी) घबरा कर डगमगाने लगे और आकाश गुंजायमान हो उठा।
विस्तृत विवेचन
यह प्रसंग बताता है कि —
1. रामकृपा का प्रभाव – साधारण वानर-भालु भी श्रीराम की कृपा से असाधारण बलशाली और पराक्रमी हो गए। यह इस तथ्य को सिद्ध करता है कि ईश्वर की कृपा से छोटा से छोटा जीव भी महान कार्य कर सकता है।
2. शकुन-अपशकुन का द्वंद्व – माता सीता को शुभ शकुन होते हैं, क्योंकि उनके हृदय में राम का नाम और विश्वास है। दूसरी ओर रावण को अशुभ संकेत मिलते हैं, क्योंकि वह अधर्म और अहंकार से भरा हुआ है।
3. सेना का बल और उत्साह – वानर-भालु पर्वत और वृक्षों को आयुध बनाकर चले। उनकी गर्जना से दिशाएँ काँप उठीं। यह दृश्य सेना की अपार शक्ति और उत्साह को दर्शाता है।
👉 इस प्रकार यह चौपाई हमें यह शिक्षा देती है कि ईश्वर की कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है, और अधर्म पर धर्म की विजय निश्चित है।
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