सुन्दर काण्ड चौपाई (296-303)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 296-303 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।

सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।

सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।

तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।

अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।

कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।

यह चौपाई सुन्दरकाण्ड से है। इसमें भगवान राम और हनुमानजी सहित संपूर्ण कपि-सेना का संवाद और रामभक्ति की महिमा वर्णित है। चलिए इसे भावार्थ और विवेचन सहित समझते हैं –

चौपाई

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।

सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।

👉 भावार्थ –

हनुमानजी विनम्रता से प्रार्थना करते हैं कि “हे प्रभु! मुझे ऐसी अटल और अखंड भक्ति दीजिए जो अत्यंत सुख देने वाली है और कभी नष्ट न होने वाली है।”

भगवान शिव की अर्धांगिनी पार्वती (भवानी) कहती हैं कि प्रभु राम का स्वभाव ऐसा है कि जो सरलता से, निष्कपट भाव से उनकी शरण जाता है, उसे यह अमूल्य भक्ति सहज ही मिलती है।

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।

👉 भावार्थ –

हे उमा! जो राम के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, उसके हृदय में कभी दूसरा भाव नहीं आ सकता।

जिसके मन में यह दिव्य संवाद बस जाता है, उसे प्रभु के चरणों में अटूट भक्ति मिलती है।

सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।

तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।

👉 भावार्थ –

जब प्रभु राम के यह वचन कपियों ने सुने तो वे सब हर्षित होकर बार-बार "जय, जय, जय" का घोष करने लगे।

तब भगवान राम ने वानरराज सुग्रीव को बुलाकर पूछा – "अब किस कारण देर की जाए? तुरंत सेना को तैयार करने का आदेश दो।"

अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।

कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।

👉 भावार्थ –

राम कहते हैं – अब देरी किस बात की है? तुरंत वानरों को आदेश दो।

यह दृश्य देखकर आकाश से देवताओं ने फूलों की वर्षा की और हर्षित होकर अपने-अपने लोकों को चले गए।

विस्तृत विवेचन

1. रामभक्ति का महत्व –

हनुमानजी के वचनों से यह सिद्ध होता है कि संसार का सबसे बड़ा धन प्रभु के चरणों की भक्ति है। यह भक्ति सुख की साक्षात् दायिनी है, क्योंकि इसमें न जन्म-मृत्यु का भय है, न दुख का स्पर्श।

2. राम का उदार स्वभाव –

माता पार्वती स्वयं कहती हैं कि राम का स्वभाव अत्यंत सरल है। वे सच्चे मन से स्मरण करने वाले भक्त को कभी निराश नहीं करते। यही कारण है कि रामभक्ति अटल और अटूट कही गई है।

3. भक्ति से प्रेरित उत्साह –

जब प्रभु ने कपियों की बात सुनी, तो सब वानर हर्षित होकर जयघोष करने लगे। यह दृश्य बताता है कि भक्ति और प्रभु की कृपा मिलने पर भक्त का मन आनंद और उल्लास से भर जाता है।

4. युद्ध की तैयारी –

यहाँ से कथा युद्ध की दिशा में बढ़ती है। श्रीराम अब विलंब नहीं करना चाहते, क्योंकि सीता माता की मुक्ति ही उनका परम उद्देश्य है। वे तुरंत सुग्रीव को सेना सजाने का आदेश देते हैं।

5. दैवीय अनुमोदन –

देवता फूलों की वर्षा करते हैं। इसका अर्थ है कि दिव्य लोक भी इस युद्ध और धर्म की स्थापना में सहयोगी हैं।

✨ सार –

इस चौपाई में हनुमानजी की प्रभु से की गई भक्ति की प्रार्थना, राम के सहज कृपालु स्वभाव, कपियों का उल्लास और युद्ध की तैयारी का सुंदर चित्रण है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि रामभक्ति ही मानव जीवन का सर्वोच्च सुख है।


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