सुन्दर काण्ड चौपाई (287-295)
सुन्दर काण्ड चौपाई 287-295 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में आती है, जहाँ श्रीराम और हनुमानजी का अत्यंत प्रेमपूर्ण मिलन वर्णित है। चलिए भावार्थ और विस्तृत विवेचन करते हैं—
चौपाई
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
भावार्थ
भगवान श्रीराम बार-बार हनुमानजी को उठाना चाहते हैं, परंतु हनुमानजी प्रेम में इतने भाव-विभोर हैं कि उठना उन्हें अच्छा नहीं लगता। प्रभु अपने करकमलों से हनुमानजी का सिर सहलाते हैं। उस समय की दशा का स्मरण करके भगवान शिव भी भावविह्वल हो जाते हैं और सावधान होकर आगे कथा कहते हैं।
चौपाई
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
भावार्थ
श्रीराम ने हनुमान को उठाकर अपने हृदय से लगाया और पास बैठाया। फिर प्रसन्न होकर उन्होंने पूछा – “हे वानर! बताओ, रावण की पालित लंका जैसे कठिन दुर्ग को तुमने किस प्रकार जलाया?” प्रभु के प्रश्न से हनुमान समझ गए कि वे अत्यंत प्रसन्न हैं। उन्होंने बिना किसी अभिमान के उत्तर दिया।
चौपाई
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
भावार्थ
हनुमान बोले – "प्रभु! मैं तो केवल शाखा से शाखा पर कूदने वाला वानर हूँ। सागर लांघकर लंका जाना, सोने की नगरी जलाना, राक्षसों को मारना और अशोक वाटिका उजाड़ना—यह सब आपके ही प्रताप से हुआ है। इसमें मेरा कोई सामर्थ्य नहीं है।"
विस्तृत विवेचन
1. भक्ति का उत्कर्ष –
हनुमानजी श्रीराम के चरणों में गिरकर उठना नहीं चाहते, क्योंकि प्रेम का नशा उन्हें वहीँ टिकाए रखता है। भक्त और भगवान का यह मिलन भक्तिरस की चरम अवस्था को दर्शाता है।
2. प्रभु का स्नेह –
श्रीराम स्वयं हनुमान को उठाकर अपने हृदय से लगाते हैं। यह भगवान की भक्तवत्सलता है—वे अपने सेवक को अपने समान स्नेह देते हैं।
3. नम्रता का आदर्श –
जब राम पूछते हैं कि लंका दहन कैसे हुआ, तो हनुमान अपने सामर्थ्य को नकारते हुए सारा श्रेय राम के प्रताप को देते हैं। यही सच्ची भक्ति और विनम्रता है।
4. भगवान शिव की भूमिका –
कथा के बीच-बीच में भगवान शिव भी भावविह्वल होते हैं। इसका अर्थ यह है कि भक्त और भगवान का यह मिलन केवल संसार के लिए नहीं, देवताओं के लिए भी आनन्द और प्रेरणा का विषय है।
👉 सारांश
यह प्रसंग हनुमानजी की अनन्य भक्ति, विनम्रता और भगवान की कृपा का जीवंत उदाहरण है। हनुमान की शक्ति का मूल उनका बल नहीं, बल्कि भगवान राम का प्रताप है।
Comments
Post a Comment