सुन्दर काण्ड दोहा (41)
सुन्दर काण्ड दोहा 41 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।
भावार्थ
हे प्रभु! श्रीराम सत्यसंकल्प वाले हैं, उनकी आज्ञा और इच्छा कभी व्यर्थ नहीं जाती। हे लंकेश! यह सभा काल (मृत्यु) के वश होकर नीति के विपरीत कार्य कर रही है। अब आप मुझे विलंब किए बिना श्रीरामचन्द्रजी की शरण जाने की अनुमति दें।
विस्तृत विवेचन
1. सत्यसंकल्प प्रभु श्रीराम –
यहाँ विभीषण रावण को समझाते हैं कि श्रीराम केवल एक राजा या मनुष्य नहीं, बल्कि सत्यसंकल्प वाले परमेश्वर हैं। उनकी इच्छा ही सत्य है, उनके संकल्प में कभी असत्य या असफलता नहीं होती। इसका अर्थ यह है कि युद्ध का परिणाम पहले ही निश्चित है – श्रीराम की विजय और रावण का पतन।
2. सभा कालबस तोरि –
विभीषण कहते हैं कि यह सभा (रावण की मंत्रिपरिषद्) काल के वश होकर चल रही है। यहाँ ‘कालबस’ का अर्थ है मृत्यु के अधीन। जब किसी का अंत निकट होता है, तो उसकी बुद्धि विपरीत दिशा में चलती है। यही कारण है कि सारे मंत्री सत्य और नीति की बातें नहीं मान रहे, बल्कि रावण को विनाश की ओर ढकेल रहे हैं।
3. रघुबीर सरन गमन –
विभीषण स्पष्ट कहते हैं कि अब मुझे विलंब मत कराओ। मैं अब विलंब किए बिना श्रीराम की शरण लेने जा रहा हूँ। शरणागति ही जीवन का परम उपाय है, क्योंकि भगवान की शरण में जाने से मृत्यु, भय और पाप सब नष्ट हो जाते हैं।
4. संदेश –
इस दोहे से यह शिक्षा मिलती है कि जब मृत्यु समीप आती है, तो विवेक नष्ट हो जाता है और सभा, मित्र, परिवार सब विपरीत सलाह देने लगते हैं। ऐसे समय में यदि मनुष्य भगवान की शरण ग्रहण कर ले, तो वही उसकी रक्षा करते हैं।
👉 इस प्रकार यह दोहा विभीषण की दृढ़ निष्ठा, श्रीराम के प्रति विश्वास और नीति की विजय को प्रकट करता है।
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