सुन्दर काण्ड दोहा (37)
सुन्दर काण्ड दोहा 37 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।। 37।।
भावार्थ
यदि मंत्री (सचिव), वैद्य (डॉक्टर) और गुरु (आचार्य) डर या लोभवश केवल प्रिय वचन ही बोलते हैं, सच्चाई नहीं बताते, तो
राज्य (राजनीति/प्रशासन),
धर्म (आध्यात्मिक जीवन/संस्कार),
और तन (शरीर/स्वास्थ्य)
—ये तीनों शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।
विस्तृत विवेचन
1. मंत्री (सचिव):
राज्य की नीति और निर्णय मंत्री पर निर्भर करते हैं। यदि मंत्री राजा को केवल वही बातें बताए जो राजा को मीठी लगें, वास्तविकता या संकट न बताए, तो राजा गलत निर्णय लेगा और राज्य नष्ट होगा।
2. वैद्य (डॉक्टर):
वैद्य यदि रोगी को केवल अच्छा-अच्छा कहकर खुश करे, परंतु रोग का सही निदान और कठोर इलाज न बताए, तो रोग बढ़ेगा और शरीर का नाश होगा।
3. गुरु (आचार्य):
यदि गुरु शिष्य से केवल प्रशंसा की बातें कहे और उसके दोषों का सुधार न करे, तो शिष्य का धर्म और जीवन पथ भ्रष्ट हो जाएगा।
👉 इस प्रकार, भय या स्वार्थवश असत्य बोलने वाले ये तीन वर्ग अपने कर्तव्य से विमुख होकर अनर्थ कर बैठते हैं।
यह दोहा आज भी शासन, चिकित्सा और शिक्षा – तीनों क्षेत्रों के लिए कालजयी चेतावनी है कि सत्य और कठोर परामर्श ही हितकारी है, न कि केवल प्रिय वचन।
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