सुन्दर काण्ड दोहा (38)

 सुन्दर काण्ड दोहा 38 का भावार्थ सहित विस्तृत 

विवेचन:

दो0 —

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।

सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।

भावार्थ

हे प्रभु! काम, क्रोध, मद और लोभ सब नरक को ले जाने वाले मार्ग हैं। इन्हें त्यागकर केवल रघुनाथ श्रीरामजी की भक्ति करो। जिन्हें संतजन भजते हैं, वही मार्ग कल्याणकारी है।

विस्तृत विवेचन

1. चार विकार – नरक का द्वार

तुलसीदासजी ने यहाँ चार प्रमुख दोषों (काम, क्रोध, मद और लोभ) की चर्चा की है। ये मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं।

काम (अत्यधिक वासना) मन को चंचल बनाती है।

क्रोध विवेक को नष्ट कर देता है।

मद (अहंकार) भगवान से और समाज से दूर करता है।

लोभ (लालच) संतोष और धर्म का नाश करता है।

ये सभी नरक के द्वार हैं, जो आत्मा को बंधन और दुख में डालते हैं।

2. सत्संग और भक्ति का मार्ग

इन सबका त्याग करके जो मार्ग अपनाना चाहिए, वह है — श्रीरामभक्ति। संतजन जिस राममय मार्ग को अपनाते हैं, वही सुरक्षित और कल्याणकारी है।

संत स्वयं इन विकारों से मुक्त रहते हैं और राम नाम में लीन रहते हैं।

उनका आचरण और भक्ति मार्ग साधकों के लिए आदर्श होता है।

3. व्यावहारिक शिक्षा

यह दोहा हमें जीवन का सरल संदेश देता है —

दुर्गुणों और विकारों से बचना ही सच्चा धर्म है।

केवल रामभक्ति ही मनुष्य को पापों और दुखों से उबारकर परम शांति और मोक्ष तक ले जाती है।

👉 निष्कर्ष यह है कि तुलसीदासजी स्पष्ट करते हैं — यदि जीवन को सफल बनाना है तो काम, क्रोध, मद, लोभ से दूर रहकर संतों की वाणी और मार्ग का अनुसरण करो तथा प्रभु श्रीराम की भक्ति में ही अपने मन को स्थिर करो।

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