सुन्दर काण्ड चौपाई (355-363)
सुन्दर काण्ड चौपाई 355-363 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में आती है, जहाँ विभीषण ने रावण को बार-बार नीति और धर्म का उपदेश दिया, परंतु रावण अपने अहंकार और क्रोध के कारण उसे अस्वीकार कर देता है। आइए भावार्थ और विस्तृत विवेचन देखें—
चौपाई
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
भावार्थ –
विभीषण ने शास्त्र, वेद और पुराण-सम्मत धर्म और नीति की बातें कहीं। परंतु उन्हें सुनकर रावण क्रोध से भर उठा और बोला – "हे मूर्ख! तेरे पास मृत्यु निकट आ चुकी है।"
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
भावार्थ –
रावण बोला – "हे मूर्ख! तेरा जीवन मैं ही अब तक ढो रहा था। तू शत्रु की पक्षधरता करता है, यह तुझे अच्छा लगता है। हे दुष्ट! ऐसा कौन है संसार में जिसे मैंने अपने भुजबल से जीता नहीं है?"
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
भावार्थ –
रावण ने कहा – "मेरे नगर में रहने वाले साधुओं और तपस्वियों के साथ तुम्हारी प्रीति है। दुष्ट! तुम जाकर उन्हीं के पास नीति की बातें करो।" इतना कहकर उसने विभीषण को पैर से लात मार दी। विभीषण ने उसके चरण पकड़कर बार-बार कहा—
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
भावार्थ –
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं – "हे उमा! संत की यही विशेषता होती है कि यदि मूर्ख को मारते हुए भी भलाई का उपदेश दिया जाए, तो भी वे उपकार करते हैं।" विभीषण ने कहा – "भले ही आपने मुझे पिता के समान मार दिया हो, परंतु आपका हित इसी में है कि श्रीराम का भजन करें।"
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
भावार्थ –
फिर विभीषण अपने चार मंत्रियों को लेकर आकाश मार्ग से लंका छोड़कर चले गए और सबको यह बात सुना दी कि अब वे रावण को छोड़कर श्रीराम की शरण में जा रहे हैं।
विस्तृत विवेचन
1. विभीषण की नीति-वाणी –
विभीषण ने रावण को बार-बार धर्म, नीति, शास्त्र और लोकमर्यादा के अनुसार समझाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रीराम भगवान हैं, उनसे विरोध करना मृत्यु को बुलाने जैसा है।
2. रावण का अहंकार –
रावण ने अपनी शक्ति और बल पर घमंड करते हुए विभीषण की बातों को अपमानजनक समझा। उसने उसे शत्रुपक्षीय और मूर्ख कहकर अपने नगर से निकाल दिया।
3. संत स्वभाव –
विभीषण ने अत्याचार और अपमान सहकर भी अपने भाई के कल्याण की बात कही। यही संत का लक्षण है— अपमान और प्रहार सहकर भी उपकार करना।
4. राम-शरणागति का संकेत –
जब रावण ने विभीषण को निकाल दिया, तब वह अपने मंत्रियों सहित श्रीराम की शरण में गए। यही प्रसंग आगे रामायण में विभीषण-शरणागति का कारण बनता है।
👉 सारांश –
इस प्रसंग में तुलसीदास जी यह सिखाते हैं कि सच्चा हितैषी वही है जो विपत्ति में भी सत्य और धर्म का उपदेश दे। विभीषण ने भाई का मोह छोड़कर धर्म और भगवान की शरण का मार्ग चुना।
Comments
Post a Comment