सुन्दर काण्ड दोहा (34)

 सुन्दर काण्ड दोहा 34 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा –

कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।

नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

भावार्थ :

जब सुग्रीव ने हनुमानजी से यह शुभ समाचार सुना कि माता सीता मिल गई हैं, तो उन्होंने तुरंत ही वानर-सेना को बुलाने का आदेश दिया। तब विभिन्न रंगों, रूपों और अपार बल वाले वानरों और भालुओं के झुंड के झुंड वहाँ आ पहुँचे।

विस्तृत विवेचन :

1. सुग्रीव का आदेश :

सीता जी का पता लग जाने के बाद श्रीराम का कार्य सिद्ध करने की घड़ी आ गई थी। सुग्रीव ने विलंब न करते हुए तुरन्त अपने सेनापतियों को बुलाकर कहा कि सेना को इकट्ठा किया जाए। यह उनके दायित्व और रामकार्य के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है।

2. सेना का आगमन :

वानर और भालुओं के दल अलग-अलग दिशाओं से उमड़ पड़े। इन सबका वर्णन “नाना बरन” से किया गया है, अर्थात् विभिन्न रंगों और रूपों वाले थे – कोई लाल, कोई श्वेत, कोई पीला, कोई काला।

3. शक्ति का वर्णन :

तुलसीदास जी लिखते हैं “अतुल बल” – इन वानरों और भालुओं की शक्ति अपार थी, जिसकी तुलना संभव ही नहीं थी। यह सेना संकल्प और उत्साह से भरी हुई थी।

4. धार्मिक संकेत :

यह प्रसंग बताता है कि जब धर्म की रक्षा हेतु कोई बड़ा कार्य सामने आता है, तो समाज के विविध वर्ग, रूप और प्रकृति के लोग भी एक ध्येय से एकत्र हो जाते हैं। विविधता में एकता ही सफलता का मार्ग बनती है।

5. रामकथा का भाव :

यह दृश्य केवल युद्ध-तैयारी नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि जब प्रभु का कार्य होता है तो सब प्राणी, चाहे वे किसी भी रूप-रंग या भेदभाव के हों, एक ध्वज तले आ जाते हैं।

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