सुन्दर काण्ड दोहा (39)
सुन्दर काण्ड दोहा 39 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।
भावार्थ
(क) – हे रावण! मैं बार-बार आपके चरण पकड़कर प्रार्थना करता हूँ, आप अभिमान, मोह और मद का त्याग कर श्रीराम का भजन करें। वही अयोध्यापति कोसलाधीश ही सच्चे शरणदाता हैं।
(ख) – यह उपदेश मुनि पुलस्ति ने अपने शिष्य से कहकर भेजा था, और वह अवसर पाकर मैं आपको कह रहा हूं।
विस्तृत विवेचन
1. रावण को अंतिम चेतावनी
यहाँ यह दिखाया गया है कि श्रीराम को केवल पराजित करना ही उद्देश्य नहीं है, बल्कि बार-बार अवसर दिया गया कि वह अपना अहंकार छोड़ दे।
"बार-बार पद लागउँ" का अर्थ है – बार-बार नम्रता से समझाया गया। यह दैवी नीति है कि दुष्ट को भी सुधरने का अंतिम अवसर मिलता है।
2. मान, मोह और मद का त्याग
मान (अभिमान) – स्वयं को सबसे बड़ा मानना।
मोह – विषयवासना और आसक्ति।
मद – शक्ति और ऐश्वर्य का गर्व।
यही तीनों रावण के पतन का कारण बने। विभीषण जी संकेत करते हैं कि यदि ये त्याग दिए जाएँ तो परमपद की प्राप्ति सरल है।
3. श्रीराम का शरणागति धर्म
"भजहु कोसलाधीस" – श्रीराम का स्मरण करने से ही सब संकट दूर हो जाते हैं। विभीषण जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि भगवान शरणागत की रक्षा अवश्य करते हैं।
4. पुलस्ति मुनि का संदेश
पुलस्ति मुनि (रावण के प्रपितामह) ने अपने शिष्य द्वारा यह बात कहलवाई। यह दिखाता है कि ऋषि-मुनि भी रावण के कल्याण की इच्छा रखते थे।
सार
इस दोहे में विभीषण जी रावण को समझाने की कोशिश कर रहे हैं यह कि अभिमान, मोह और मद मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। यदि इनका परित्याग करके हम भगवान के चरणों में शरण लें, तो जीवन सफल हो जाता है।
रावण को भी यही अवसर दिया गया, लेकिन उसने नहीं माना, और अंत में उसका नाश हुआ।
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