सुन्दर काण्ड चौपाई (323-331)
सुन्दर काण्ड चौपाई 323-331 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।
चौपाई
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
मतलब – जब रावण ने यह समाचार सुना तो अभिमान से हँसने लगा। उसका स्वभाव अहंकारपूर्ण था और वह जगत में अभिमानी के रूप में प्रसिद्ध था।
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
मतलब – मंदोदरी का स्वभाव स्वाभाविक रूप से भययुक्त था (स्त्रियों का स्वभाव भयभीत होने वाला माना गया है)। जहाँ सब मंगल का अवसर है, वहाँ भी उसका मन भय से विचलित हो उठता था।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
मतलब – रावण हँसकर कहता है कि यदि बंदरों की सेना भी आ जाए तो उन्हें राक्षस बिना सोचे-समझे खा जाएंगे। वे उनका क्या बिगाड़ लेंगे।
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
मतलब – जिस रावण के भय से लोकपाल (इंद्र आदि देवता) भी काँपते हैं, उसकी स्त्री मंदोदरी का डरना और व्याकुल होना बड़ी हँसी की बात प्रतीत होती है।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
मतलब – रावण मंदोदरी को हँसते हुए हृदय से लगा लेता है और फिर मोहवश सभा की ओर चल पड़ता है।
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
मतलब – मंदोदरी के हृदय में गहरी चिंता छा गई। उसे आभास हो गया कि विधाता अब मेरे पति (रावण) पर प्रतिकूल हो गया है।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
मतलब – रावण दरबार में बैठकर यह सूचना सुनता है कि सागर के पार राम की पूरी वानर सेना आ चुकी है।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
मतलब – रावण अपने मंत्रियों से उचित सलाह माँगता है, लेकिन वे सब मंत्री उसकी प्रसन्नता के कारण केवल हँसी-मज़ाक में टाल जाते हैं और सच्चा परामर्श नहीं देते।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।
मतलब – वे मंत्री हँसकर कहते हैं कि जब तुमने देवताओं और असुरों को जीत लिया, तब तुम्हें कोई श्रम नहीं पड़ा, तो मनुष्य और वानरों को भला किस गिनती में मानोगे?
भावार्थ एवं विवेचन
1. रावण का अहंकार – रावण पहले से ही अभिमानी था। हनुमानजी द्वारा अकेले लंका में उत्पात मचाने और जलाने पर भी उसने इसे गंभीरता से नहीं लिया और हँसकर टाल दिया। उसका मानना था कि वानरों की सेना राक्षसों के सामने कुछ भी नहीं है।
2. मंदोदरी की दूरदर्शिता – मंदोदरी भयभीत होकर बार-बार अपने पति को समझाती है, क्योंकि उसे लगता है कि श्रीराम के पक्ष में दैव खड़ा है। परंतु रावण उसकी आशंका को स्त्री का स्वाभाविक भय मानकर उपहास करता है।
3. मंत्रियों की चापलूसी – जब रावण ने मंत्रियों से राय माँगी तो उन्होंने सच कहने की बजाय खुशामद में उसकी शक्ति का गुणगान किया। यही उसकी हार का कारण बना, क्योंकि न राजा ने सच्चाई समझी और न मंत्रियों ने सही सलाह दी।
4. संदेश – इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार और चापलूसी राजा का नाश कर देती है। सही समय पर सत्य स्वीकार करना और उचित परामर्श लेना ही नीति है। मंदोदरी की चिंता वास्तव में भविष्य की सच्चाई थी, लेकिन रावण ने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया।
👉 सार यही है कि यह चौपाई रावण के घोर अहंकार, मंदोदरी की आशंका और मंत्रियों की चापलूसी को प्रकट करती है, जो अंततः लंका के विनाश का कारण बनी।
Comments
Post a Comment