सुन्दर काण्ड छंद 1-2
सुन्दर काण्ड छंद 1-2 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
छं0-चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।
दिए हुए छन्द सुन्दरकाण्ड में भगवान राम के प्रस्थान और उनके प्रभाव का दिव्य वर्णन किया गया है। आइए पहले भावार्थ देखें, फिर विस्तृत विवेचन करेंगे।
✨ भावार्थ
इस छन्द में वर्णन है कि जब प्रभु श्रीराम प्रस्थान करते हैं, तब सम्पूर्ण सृष्टि हर्षित हो उठती है। हाथियों का चक्कराना, पर्वतों का डोलना, समुद्र का उफनना—सब राम की महिमा और प्रभाव को व्यक्त करते हैं। देवता, गंधर्व, मुनि, नाग, किन्नर आदि सबके दुख दूर हो जाते हैं और वे “जय श्रीराम” का गुणगान करने लगते हैं।
सर्पराज शेष भी प्रभु के भार से बार-बार मोह में पड़ते हैं, और अपनी दाढ़ों से कठोर कछुए की पीठ को पकड़कर पृथ्वी को स्थिर करने का प्रयास करते हैं। यह दृश्य ऐसा लगता है मानो शेषनाग अब अमिट अक्षरों में राम की महिमा पृथ्वी पर अंकित कर रहे हों।
📖 विस्तृत विवेचन
1. प्रकृति की अद्भुत प्रतिक्रिया
“चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे”—जब भगवान राम की दिव्य सेना आगे बढ़ती है, तब दिग्गज (दिक्पालों के हाथी), पर्वत और समुद्र सब डोलने लगते हैं।
यह डोलना भय का नहीं, बल्कि प्रभु के प्रताप और महिमा की स्वीकृति है।
2. देवताओं का हर्ष
देवता, गंधर्व, मुनि, नाग, किन्नर सब अपने दुखों से मुक्त होकर राम के गुण गाने लगते हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि प्रभु के नाम-स्मरण मात्र से भी सब दुख हर जाते हैं।
3. शेषनाग का धैर्य-परीक्षण
“सहि सक न भार उदार अहिपति”—पृथ्वी को संभाले हुए शेषनाग भी राम के विराट भार से बार-बार विचलित हो जाते हैं।
वे अपने दांतों से कछुए (कूर्म अवतार) की कठोर पीठ को पकड़ते हैं ताकि धरती स्थिर रह सके।
4. आध्यात्मिक संकेत
यह दृश्य प्रतीक है कि प्रभु का प्रताप इतना महान है कि धरणी धारण करने वाले अनंत शेष भी उसके सामने विस्मित हो उठते हैं।
अंत में तुलसीदासजी कहते हैं—मानो शेषनाग अपने फन को कलम बनाकर, कछुए की पीठ को पट्टिका मानकर, राम की महिमा को अक्षय अक्षरों में अंकित कर रहे हों।
👉 निष्कर्षतः, इस छन्द का मर्म है—प्रभु श्रीराम के प्रताप से संपूर्ण जगत पुलकित, भय-निरस्त और आनंदमय हो उठता है। उनकी महिमा ऐसी है कि सृष्टि का आधार भी उसे संभालने में स्वयं को तुच्छ अनुभव करता है।
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