सुन्दर काण्ड छंद
सुन्दर काण्ड के अंतिम छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
छंद –
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।
भावार्थ (सारांश):
जब सागर ने श्रीराम की आज्ञा मानकर अपना मार्ग देने का निर्णय लिया, तब श्रीराम अयोध्या लौटे। यह सब घटना भगवान की लीला थी, जो भक्तों के कल्याण हेतु हुई। तुलसीदासजी कहते हैं कि उन्होंने अपनी बुद्धि और श्रद्धा के अनुसार इस पवित्र चरित्र का गान किया है।
श्रीराम के गुणों का गान दुख, संशय और विषाद को नष्ट कर सुख का कारण बनता है। जो मनुष्य सब आशाएँ और भरोसे छोड़कर निरंतर श्रीराम के गुणों को गाते और सुनते हैं, वे संसार के दुःखों से मुक्त हो जाते हैं।
विस्तृत विवेचन:
1. "निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।"
– सागर ने अपने स्थान पर लौटकर श्रीराम को मार्ग देने का निश्चय किया। यह लीला भगवान को अत्यंत प्रिय लगी क्योंकि यह उनकी दया और मर्यादा दोनों को प्रकट करती है।
2. "यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।"
– तुलसीदासजी कहते हैं कि उन्होंने अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार इस सुंदरकाण्ड के चरित्र का वर्णन किया है, जो कलियुग के पापों का नाश करने वाला है।
3. "सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।"
– श्रीराम के गुणों का गान सुख का भंडार है, यह संशय (संदेह) और विषाद (दुःख) को मिटा देता है।
4. "तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।"
– तुलसीदासजी शिक्षा देते हैं कि हे मूर्ख मन! संसार की सब आशाएँ और भरोसे छोड़कर श्रीराम के गुणों का गान और श्रवण कर, यही सच्चा कल्याण मार्ग है।
शिक्षा:
इस छंद से हमें यह सिख मिलती है कि भगवान श्रीराम के गुणों का स्मरण, गान और श्रवण करने से कलियुग के पाप दूर होते हैं, मन को शांति मिलती है और जीवन में सच्चा सुख प्राप्त होता है।
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