सुन्दर काण्ड चौपाई (414-421)
सुन्दर काण्ड चौपाई 414-421 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में आती है, जहाँ समुद्र (सागर देवता) प्रभु श्रीराम से क्षमा माँगकर सेतु बाँधने का उपाय बताते हैं। आइए इसका भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन देखें —
चौपाई:
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
भावार्थ:
हे प्रभु! नल और नील दो वानर भाई हैं। इन्हें बचपन में ही ऋषियों से यह वरदान प्राप्त हुआ था कि इनके द्वारा फेंके गए पत्थर जल में नहीं डूबेंगे। यदि आप की आज्ञा हो तो ये भाई अपने परिश्रम से समुद्र पर पुल बाँध देंगे और आपकी ही महिमा से वह स्थिर रहेगा।
विवेचन:
सागर देवता श्रीराम से कहते हैं कि मेरे भीतर आपकी सेना तभी पार कर सकती है जब आप नल और नील की सहायता लें। ऋषियों के वरदान से इन दोनों का स्पर्श पाकर भारी पत्थर भी नहीं डूबते। इस प्रकार आपका सेतु बन जाएगा और संसार में आपकी कीर्ति अमर होगी।
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
भावार्थ:
हे प्रभु! आप अपनी प्रभुता हृदय में धारण करके नल-नील को आदेश दीजिए। हनुमानजी की सहायता से इस विधि से समुद्र को बाँधिए ताकि यह दिव्य कार्य तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो जाए।
विवेचन:
यहाँ श्रीराम के दिव्य पुरुषार्थ और भक्तों की सहभागिता का संदेश है। प्रभु स्वयं सब कुछ कर सकते हैं, परंतु वे अपने भक्तों को महत्त्व देते हैं ताकि उनका यश फैले और भक्तों को भी गौरव मिले।
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
भावार्थ:
हे नाथ! मेरे इस समुद्र के उत्तर तट पर रहने वाले दुष्ट पापी मनुष्यों को नष्ट करें।
यह सुनकर कृपालु श्रीराम ने सागर की पीड़ा हर ली और क्रोध शांत किया।
विवेचन:
यहाँ सागर अपनी ओर से दुष्ट लोगों के नाश की प्रार्थना करता है। श्रीराम का क्रोध उनके लिए वरदान बन गया — उन्होंने सागर की वेदना मिटा दी।
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
भावार्थ:
जब सागर ने श्रीराम का महान बल और पराक्रम देखा, तो वह प्रसन्न और सुखी हो गया।
उसने सम्पूर्ण उपाय बता कर प्रभु को प्रणाम किया और अपने लोक को चला गया।
विवेचन:
सागर को ज्ञात हो गया कि राम केवल मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं, साक्षात् परमेश्वर हैं। भय समाप्त होकर आनंद उत्पन्न हुआ। इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि जब अहंकार और भय समाप्त होते हैं, तभी सच्ची भक्ति और शांति प्राप्त होती है।
संक्षिप्त शिक्षा:
1. भगवान अपने भक्तों को भी कार्य-सिद्धि में सहभागी बनाते हैं।
2. जब हम विनम्र होकर शरण में जाते हैं, तब संकट दूर होकर आनंद मिलता है।
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