सुन्दर काण्ड दोहा (27)

 सुन्दर काण्ड दोहा 27 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा

जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।

चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।

शब्दार्थ

जनकसुतहि – जनक की पुत्री (माता सीता) को।

समुझाइ करि – समझा-बुझाकर।

बहु बिधि धीरजु दीन्ह – अनेक प्रकार से धैर्य बँधाया।

चरन कमल सिरु नाइ – चरणकमलों पर सिर झुकाया।

कपि गवनु राम पहिं कीन्ह – वानर (हनुमानजी) ने रामजी के पास जाने का संकल्प/गमन किया।

भावार्थ

हनुमानजी ने माता सीता को अनेक प्रकार से समझा-बुझाकर धैर्य दिलाया कि प्रभु श्रीराम शीघ्र ही उन्हें रावण की कैद से मुक्त करेंगे। फिर उन्होंने माता के चरणकमलों में सिर झुकाकर प्रणाम किया और वहाँ से श्रीरामजी के पास लौटने की तैयारी की।

विस्तृत विवेचन

इस प्रसंग में हनुमानजी ने अपना संदेशवाहक धर्म पूर्ण किया।

1. सीता माता को धीरज देना – रावण की कैद में दुखित और निराश माता को हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम की शक्ति, सामर्थ्य और उनके संकल्प का स्मरण कराते हुए आश्वासन दिया कि उनका उद्धार निश्चित है। यह केवल सांत्वना नहीं थी, बल्कि भक्ति और विश्वास का संचार था।

2. सेवक का आदर्श आचरण – माता को आश्वस्त करने के बाद हनुमानजी ने विनम्रता से उनके चरणों में प्रणाम किया। यहाँ हनुमानजी का चरित्र सेवाभाव, मर्यादा और आदर का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

3. राम के प्रति दायित्व – अब हनुमानजी का कर्तव्य था कि वे शीघ्र श्रीरामजी के पास जाकर सीता माता की सच्ची स्थिति बताएं। इसलिए वे विलंब न करके तुरंत वापस जाने का निश्चय करते हैं।

संदेश

विपत्ति में धैर्य और प्रभु पर विश्वास ही सबसे बड़ा सहारा है।

सच्चा सेवक केवल संदेश पहुँचाने वाला नहीं होता, बल्कि वह धीरज और विश्वास दिलाने वाला भी होता है।

विनम्रता और कर्तव्यपरायणता ही भक्त का वास्तविक आभूषण है।

Comments

Popular posts from this blog

सुन्दर काण्ड (चौपाई 15-16)

सुन्दर काण्ड चौपाई ( 33-40)

सुन्दर काण्ड चौपाई (195-204)