सुन्दर काण्ड दोहा ( 26)
सुन्दर काण्ड दोहा 26 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा
“पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।
भावार्थ
हनुमानजी ने अपनी जली हुई पूँछ को बुझाया और थकान मिटाकर फिर से छोटा रूप धारण कर लिया। तत्पश्चात वे माता सीता जी के सामने हाथ जोड़कर विनीत भाव से खड़े हो गए।
विस्तृत विवेचन
लंका दहन करने के पश्चात जब हनुमानजी ने समुद्र और पर्वतों की ओर दृष्टि डाली तो उन्हें स्मरण हुआ कि उनका मुख्य कार्य माता सीता जी को प्रभु श्रीराम का संदेश देना है और उन्हें यह विश्वास दिलाना है कि प्रभु शीघ्र ही उन्हें उद्धार करेंगे।
1. पूँछ बुझाना और श्रम खोना –
हनुमानजी की पूँछ में जो अग्नि लगाई गई थी, वह भगवान की कृपा से सीता जी की शक्ति के कारण दाहक न होकर शीतल हो गई। फिर भी लंका-दहन के उपरान्त उन्होंने उसे बुझाकर विश्राम किया और श्रम मिटाया। यह इस बात का प्रतीक है कि पराक्रम के बाद भी साधक को शांति और संयम की ओर लौटना चाहिए।
2. लघु रूप धारण करना –
हनुमानजी जब रावण की लंका में आतंक मचा रहे थे, तब उनका विशाल रूप था। लेकिन जब माता सीता के दर्शन हेतु आए तो उन्होंने फिर से विनम्र लघु रूप धारण किया। यह दर्शाता है कि सेवा और भक्ति के समय अहंकार या शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि विनय और नम्रता ही शोभा पाती है।
3. सीता जी के सामने हाथ जोड़कर खड़े होना –
यहाँ हनुमानजी का भाव पूर्णतः दास्य-भाव है। सीता जी को भगवान की अर्धांगिनी और ‘माता’ मानकर वे अत्यन्त श्रद्धा, विनय और करबद्ध होकर सामने खड़े हुए। यह भक्त और भगवान के बीच गहन संबंध का प्रतीक है – जहाँ पराक्रमी वीर भी अपने आराध्य के समक्ष बालक की तरह सरल हो जाता है।
सार
इस दोहे में हनुमानजी का चरित्र दो रूपों में प्रकट होता है –
एक ओर वीर, पराक्रमी, लंका दहन करने वाले।
दूसरी ओर विनम्र, भक्त और दास्य-भाव से पूर्ण।
यही हनुमानजी की सबसे बड़ी विशेषता है – शक्ति और भक्ति का अद्भुत संगम।
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