सुन्दर काण्ड चौपाई (255-262)
सुन्दर काण्ड चौपाई 255-262 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड से ली गई है, जिसमें हनुमानजी सीता माता का समाचार लेकर लौटते हैं और श्रीराम से मिलन की कथा आती है। आइए भावार्थ और विस्तृत विवेचन देखें:
✨ चौपाई
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
👉 भावार्थ :
यदि हनुमानजी सीता माता का समाचार लेकर न लौटे होते, तो वानरों का साहस इतना न था कि वे मधुबन में जाकर फल खा पाते। इस प्रकार विचार कर सुग्रीव सहित सभी वानर हनुमानजी के साथ श्रीराम के पास आए।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
👉 भावार्थ :
सब वानर आकर प्रभु रामचन्द्रजी के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं। श्रीरामजी सबको प्रेमपूर्वक मिले और उनकी कुशल पूछी। उनके चरणों को देखकर सब समझ गए कि यह कार्य विशेष रूप से रामकृपा से ही सिद्ध हुआ है।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।।
👉 भावार्थ :
सुग्रीव ने कहा – "हे नाथ! यह कार्य हनुमानजी ने ही किया है, जिन्होंने सारे वानरों के प्राणों को बचा लिया।" यह सुनकर श्रीरामजी पुनः हनुमान से मिले और सब वानरों सहित उनके पास चल पड़े।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
👉 भावार्थ :
जब वानरों ने देखा कि श्रीरामजी उनकी ओर आ रहे हैं, तो अपने कार्य की सिद्धि पर वे विशेष हर्षित हुए। उस समय दोनों भाई (राम और लक्ष्मण) फटिक (संगमरमर जैसी शिला) पर बैठे थे। सब वानर दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़े।
🪔 विस्तृत विवेचन
यह प्रसंग उस समय का है जब हनुमानजी माता सीता का समाचार लेकर लौटते हैं।
1. मधुबन घटना – वानरों ने उत्साह और विजय उल्लास में मधुबन को रौंद डाला और फल खाए। सुग्रीव ने समझा कि यदि सीता माता का समाचार न मिला होता तो वानरों में यह उत्साह नहीं आता।
2. राम से मिलन – सब वानर हनुमान के नेतृत्व में श्रीराम के पास आते हैं। चरणों में सिर नवाकर वे अपनी भक्ति और कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
3. हनुमान की महिमा – सुग्रीव स्वयं स्वीकार करते हैं कि यह महान कार्य केवल हनुमानजी के कारण संभव हुआ है। वास्तव में यह सम्पूर्ण वानर दल के प्राणों की रक्षा थी, क्योंकि सीता का पता न चलता तो सब व्यर्थ हो जाता।
4. रामकृपा का प्रभाव – सब वानर समझ जाते हैं कि यह सफलता केवल श्रीराम की कृपा से ही मिली है, क्योंकि उनका कार्य दैवी संयोग से ही सिद्ध होता है।
5. भक्ति का वातावरण – जब सब वानर चरणों में गिरते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि विजय और सफलता का वास्तविक फल अहंकार नहीं बल्कि प्रभु चरणों में समर्पण है।
🌹 सारांश
इस चौपाई में यह संदेश है कि –
प्रभु का कार्य हनुमान जैसे भक्तों के माध्यम से सिद्ध होता है।
सफलता मिलने पर अहंकार नहीं, बल्कि प्रभु चरणों में नम्रता और भक्ति ही जीवन का शृंगार है।
Comments
Post a Comment