सुन्दर काण्ड दोहा (25)

 सुन्दर काण्ड दोहा 25 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन :


दोहा

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

भावार्थ

इस दोहे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने बताया है कि जब लंका-दहन के लिए हनुमान जी अपनी पूँछ में आग लगवाकर प्रज्वलित हुए, तब भगवान श्रीराम की प्रेरणा से उनचासों प्रकार की वायुदेव हनुमान जी की सहायता के लिए आ पहुँचे।

हनुमान जी ने प्रचण्ड अट्टहास किया और भयानक गर्जना करते हुए आकाश में उछल पड़े। यह दृश्य देखकर सब राक्षस भयभीत हो गए।

विस्तृत विवेचन

1. भगवान की प्रेरणा

हनुमान जी का प्रत्येक कार्य केवल उनकी शक्ति से नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम की प्रेरणा और कृपा से होता है। यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि "हरि प्रेरित" अर्थात श्रीराम की आज्ञा और शक्ति के बिना कुछ भी संभव नहीं है।

उनके आशीर्वाद से ही प्रकृति की शक्तियाँ भी सहयोग देने लगती हैं।

2. मरुतों का सहयोग

"मरुत उनचास" से तात्पर्य है वायु के उनचास स्वरूप।

जब हनुमान जी ने लंका दहन का निश्चय किया तो वायु के सभी रूप एकत्र होकर उन्हें प्रचण्ड शक्ति और वेग देने लगे।

यह दर्शाता है कि जब कोई भक्त प्रभु की प्रेरणा से कार्य करता है, तो सम्पूर्ण प्रकृति भी उसके सहयोग में आ जाती है।

3. हनुमान जी का पराक्रम

अग्नि लगी पूँछ लेकर भी हनुमान जी हँस रहे थे और भयानक गर्जना कर रहे थे।

यह अट्टहास उनके अद्भुत पराक्रम और आत्मविश्वास का प्रतीक है।

वे लंका को जलाकर श्रीराम के कार्य को सिद्ध करने के लिए उत्साह और आनंद से भरे थे।

4. आकाश में उड़ान

अग्नि से दग्ध पूँछ होने पर भी वे दुःखी नहीं हुए, बल्कि आनंदपूर्वक आकाश में उड़ने लगे।

इसका तात्पर्य है कि भक्त जब भगवान के कार्य में लग जाता है तो दुख और पीड़ा उसे प्रभावित नहीं कर पाती।

✅ निष्कर्ष

यह दोहा बताता है कि हनुमान जी का पराक्रम केवल उनकी व्यक्तिगत शक्ति नहीं, बल्कि भगवान की प्रेरणा और प्रकृति की सहायक शक्तियों का सम्मिलित परिणाम है। जब कोई कार्य ईश्वर-प्रेरित होता है, तब सम्पूर्ण सृष्टि भी उस भक्त के साथ खड़ी हो जाती है।

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