सुन्दर काण्ड चौपाई (247-254)

  सुन्दर काण्ड चौपाई 247-254 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई:

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।

नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।

हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।

मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।

मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।

चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।

तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।

रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।

यह प्रसंग उस समय से जुड़ी हैं जब हनुमान जी लंका-दहन कर समुद्र लांघकर लौटते हैं और सब वानरों को अपनी विजय-गाथा सुनाते हैं।

चौपाई (अर्थ सहित):

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।

👉 जब हनुमानजी लंका से चले तो उन्होंने प्रचण्ड गर्जना की। उसकी गूँज इतनी भयानक थी कि राक्षस-नारियों के गर्भ भी गिरने लगे।

नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।

👉 हनुमानजी समुद्र लाँघकर इस पार आ गए और आते ही जोर से किलकारी मारकर सब वानरों को अपनी सफलता का समाचार दिया।

हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।

👉 सब वानर हनुमानजी को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और ऐसा जान पड़ा मानो उन्हें नया जीवन प्राप्त हो गया हो।

मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।

👉 हनुमानजी का मुख प्रसन्न था, शरीर पर अद्भुत तेज झलक रहा था। क्योंकि उन्होंने श्रीराम का कार्य सिद्ध कर दिया था।

मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।

👉 सभी वानर उनसे मिले और ऐसा सुख अनुभव किया जैसे जल के लिए तड़पती मछलियों को जल मिल जाए।

चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।

👉 वे सब हर्षपूर्वक श्रीरामजी के पास चल पड़े और रास्ते भर नये-नये प्रसंग पूछते और सुनाते रहे।

तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।

👉 फिर सब वानर मधुबन में पहुँचे। अंगद की आज्ञा से वहाँ के फल खाने लगे।

रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।

👉 जब मधुबन के रखवाले उन्हें रोकने लगे, तब वानरों ने उन्हें घूँसों से पीटा और वे सब भाग खड़े हुए।

विस्तृत विवेचन :

यह प्रसंग हनुमानजी के अद्भुत साहस और विजय का द्योतक है।

1. हनुमानजी की विजय-घोषणा :

लंका-दहन के बाद जब हनुमानजी ने गर्जना की तो वह केवल एक साधारण ध्वनि नहीं थी, बल्कि राक्षसों के अहंकार को चकनाचूर करने वाली शक्ति थी। इससे दुष्ट राक्षसी स्त्रियाँ भी भय से काँप उठीं।

2. वानरों का हर्ष :

जब वानरों ने उन्हें सकुशल लौटते देखा तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। यह प्रसन्नता केवल मित्र की वापसी की नहीं थी, बल्कि यह इस विश्वास का भी प्रतीक थी कि अब सीता माता का पता मिल गया और रामकार्य सफल होगा।

3. हनुमानजी का तेजस्वी रूप :

उनके चेहरे पर अलौकिक प्रसन्नता और तेज झलक रहा था, जो इस बात का प्रमाण था कि श्रीरामजी का कार्य सम्पन्न हुआ। जैसे भगवान का काम करने से व्यक्ति स्वतः ही दिव्यता से ओतप्रोत हो जाता है।

4. मधुबन प्रसंग :

सब वानरों का उत्साह इतना बढ़ा कि वे मधुबन में पहुँचकर फल खाने लगे। यह घटना वानरों की स्वाभाविक चपलता और उनकी विजय की खुशी का प्रतीक है। जब रखवाले उन्हें रोकते हैं तो वे शक्ति-प्रदर्शन कर उन्हें भगा देते हैं।

निष्कर्ष :

इन चौपाइयों में यह शिक्षा निहित है कि –

भगवान का कार्य निःस्वार्थ भाव से करने पर व्यक्ति दिव्य आनंद और तेज प्राप्त करता है।

विजय और सफलता का उत्सव सभी को आनन्दित करता है, लेकिन वह केवल ईश्वर की कृपा और भक्ति से सम्भव है।

हनुमानजी की गर्जना, उनका पराक्रम और लौटने पर वानरों का उत्साह — यह सब भक्त और भगवान के बीच के अद्भुत संबंध को दर्शाता है।


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