सुन्दर काण्ड दोहा (24)

 सुन्दर काण्ड दोहा 24 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0—कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।

तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।

भावार्थ

रावण अपने मंत्रियों और राक्षसों से कहता है—"वानर अपनी पूँछ पर बहुत अभिमान और ममता रखता है। इसलिए इसकी पूँछ को कपड़ों से लपेटकर तेल में भिगो दो और फिर उसमें आग लगा दो।"

विस्तृत विवेचन

इस दोहे में रावण की दुष्टबुद्धि और अहंकार प्रकट होता है।

1. वानर की पहचान पर चोट

रावण को ज्ञात है कि वानर अपनी पूँछ को बहुत गौरव और प्रिय मानते हैं।

इसी कारण उसने सोचा कि यदि पूँछ का अपमान किया जाए तो हनुमान को अत्यंत कष्ट होगा।

रावण की नीयति यह नहीं थी कि केवल हनुमान को दण्ड दिया जाए, बल्कि उसकी आत्मा को अपमानित किया जाए।

2. रावण का मूर्खतापूर्ण निर्णय

उसने पूँछ में कपड़े बाँधकर तेल डालने और आग लगाने की आज्ञा दी।

परन्तु यही उसकी मूर्खता थी, क्योंकि आग से लंका ही भस्म होनी थी।

यह प्रसंग बताता है कि जब अहंकार बुद्धि पर हावी हो जाता है तो व्यक्ति स्वयं अपने विनाश का मार्ग प्रशस्त करता है।

3. आध्यात्मिक संकेत

पूँछ यहाँ "अहंकार" का प्रतीक है।

जब इसे जलाया जाता है, तब दुष्टता, पाप और असत्य का सर्वनाश होता है।

रावण का दम्भ इसी प्रसंग से चरम सीमा पर पहुँचता है और यही आगे उसके विनाश का कारण बनता है।

👉 निष्कर्ष यह है कि रावण ने हनुमान को अपमानित करने के लिए जो उपाय किया, वही उसके नगर के सर्वनाश का कारण बन गया। यह सिखाता है कि दूसरों को अपमानित करने के प्रयास में अक्सर व्यक्ति स्वयं अपने पतन का बीज बो देता है।

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