सुन्दर काण्ड दोहा (23)
सुन्दर काण्ड दोहा 23
का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा –
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।
भावार्थ
हे रावण! यह मोह (अज्ञान) अनेक प्रकार के दुःखरूपी शूल (काँटे) प्रदान करने वाला है। इसी से तम (अंधकार रूप) अभिमान भी उत्पन्न होता है। अतः मोह और अभिमान का त्याग कर, आप कृपा के समुद्र, भगवान श्रीराम (रघुनायक) का भजन करो।
विस्तृत विवेचन
1. मोहमूल बहु सूल प्रद
"मोह" संसार के दुःखों की जड़ है।
जब मनुष्य मोहग्रस्त होता है, तो उसे लोभ, वासना, क्रोध, ईर्ष्या आदि अनेक प्रकार के दुःख मिलते हैं।
हनुमान जी रावण को समझाते हैं कि मोह वैसा ही है जैसे जड़ में कीड़ा लग जाए तो पूरा वृक्ष नष्ट हो जाता है।
2. त्यागहु तम अभिमान
मोह से ही "अभिमान" जन्म लेता है, और अभिमान मनुष्य को अंधकार (तम) में डाल देता है।
अभिमान में व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है और ईश्वर से दूर हो जाता है।
इसीलिए साधक के लिए अभिमान का त्याग सबसे पहला साधन बताया गया है।
3. भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान
मोह और अभिमान का त्याग करने के बाद मनुष्य का हृदय निर्मल होता है।
निर्मल मन ही भक्ति के योग्य है।
श्रीराम ‘कृपा सिंधु’ हैं, जो अपने भक्तों पर बिना भेदभाव के अनुग्रह बरसाते हैं।
अतः उनका भजन करने से जीवन के सभी बंधन कट जाते हैं और आत्मा शांति पाती है।
✅ निष्कर्ष
इस दोहे में हनुमान जी ने रावण को चेतावनी दी है कि मोह और अभिमान छोड़कर यदि वह श्रीराम के चरणों में भक्ति करे, तो वहीं उसका सच्चा कल्याण है।
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