सुन्दर काण्ड चौपाई (222-230)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 222-230 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

  चौपाई:

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।

जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।

जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।

कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।

पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।

चौपाई

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।

जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई।।

👉 रावण कहता है – "जब यह पूँछहीन हो जाएगा, तब इस दुष्ट को इसके स्वामी (राम) के पास भेज देना। जिनकी यह बहुत बड़ाई करता है, मैं देखता हूँ उनकी प्रभुता कैसी है।"

➡️ यहाँ रावण का अहंकार और अविवेक प्रकट होता है। वह भगवान श्रीराम को भी केवल एक साधारण मानव समझता है।

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।

जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।

👉 रावण की बात सुनकर हनुमानजी मन ही मन मुस्कराए। उन्हें लगा कि माँ सरस्वती अब रावण के विरुद्ध हो गई हैं और उसी के मुख से विनाशकारी वचन बुलवा रही हैं।

➡️ राक्षस मूर्खता में फँसकर आग लगाने की तैयारी करने लगे।

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।

कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।

👉 राक्षसों ने नगर भर से वस्त्र, घी, तेल सब इकठ्ठा कर लिया और हनुमानजी की पूँछ पर बाँधकर आग लगा दी।

➡️ नगर के लोग तमाशा देखने लगे। कोई पैर मारता, कोई हँसी उड़ाता। यह सब हनुमानजी के लिए खेल

 था।

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।

पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।

👉 नगाड़े बजाए जाने लगे, बाँसुरी और मृदंग बजे। रावण की सेना हनुमानजी को नगर-नगर घुमा रही थी।

➡️ तभी हनुमानजी ने लघुरूप धारण किया, जिससे बँधी हुई पूँछ को आसानी से नियंत्रित कर सकें।

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।

👉 फिर हनुमानजी ने उछलकर सोने की अटारियों पर चढ़ना शुरू कर दिया। उन्हें देखकर राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गईं।

➡️ अब हनुमानजी नगर दहन करने

 जा रहे हैं।

भावार्थ (संक्षेप में)

इस प्रसंग में हनुमानजी की पूँछ में रावण के आदेश से आग लगाई गई। राक्षस और लंकावासी उनका उपहास करते रहे। परंतु हनुमानजी तो संकटमोचन हैं, उनके लिए यह अपमान भी एक अवसर बन गया। लघुरूप धारण कर उन्होंने अपनी पूँछ को नियंत्रित किया और फिर सोने की लंका को दहन कर रावण के अहंकार को भस्म करने की तैयारी की।

विस्तृत विवेचन

1. रावण का अहंकार और अविवेक –

वह भगवान राम को "साधारण मानव" समझकर हनुमानजी का उपहास करता है। यही उसका सर्वनाश का कारण बनता है।

2. हनुमानजी की दिव्य शक्ति –

पूँछ में आग लगने के बावजूद हनुमानजी को कष्ट नहीं हुआ। बल्कि उन्होंने इसे खेल बना लिया।

3. दैवीय योजना –

रावण स्वयं अपने विनाश का मार्ग बनाता है। माँ सरस्वती उसके मुख से वही बुलवाती हैं जो विनाशकारी है।

4. लंका दहन की भूमिका –

यह घटना लंका-दहन की भूमिका है। हनुमानजी अब पूरे नगर को जलाकर राक्षसों को श्रीराम की शक्ति का परिचय देंगे।

👉 संदेश: जब अहंकारी व्यक्ति भगवान का उपहास करता है, तब वही उपहास उसके विनाश का कारण बनता है।

हनुमानजी की पूँछ में लगी आग ने सम्पूर्ण लंका को जला दिया, परंतु सीता जी के आश्रय स्थल को नहीं छुआ। यह उनकी दिव्य करुणा और विवेक का प्रतीक है।



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