सुन्दर काण्ड दोहा (22)
सुन्दर काण्ड दोहा 22 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा – 22
“प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।। ”
भावार्थ
हे रावण! श्रीराम प्रणतपालक (शरणागत की रक्षा करने वाले), करुणा सागर और खर-दूषण आदि राक्षसों के संहारक हैं। यदि तुम अपने अहंकार और अपराधों को छोड़कर उनकी शरण में जाओगे, तो वे निश्चित ही तुम्हारे अपराध क्षमा कर देंगे और तुम्हें अपनी शरण में रख लेंगे।
विस्तृत विवेचन
1. प्रणतपाल रघुनायक – भगवान श्रीराम का स्वभाव ही यह है कि वे शरणागत की रक्षा करते हैं। कोई कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो, यदि वह निष्ठापूर्वक शरण में आता है तो प्रभु उसकी रक्षा करते हैं। जैसे – विभीषण ने लंका त्यागकर राम की शरण ली, तो प्रभु ने बिना किसी विचार के उसे स्वीकार किया।
2. करुणा सिंधु – राम अनंत दया के सागर हैं। उनके लिए दंड से अधिक महत्त्वपूर्ण है – जीव का उद्धार। यदि रावण भी उसी समय अहंकार त्यागकर शरण में आता, तो प्रभु अवश्य उसे क्षमा कर देते।
3. खरारि – खर-दूषण जैसे दुष्ट राक्षसों का वध कर श्रीराम ने यह सिद्ध किया कि वे धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए अवतरित हुए हैं। परंतु उनका असली उद्देश्य जीव का कल्याण है, विनाश उनका अंतिम उपाय है।
4. अपराध क्षमा – यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी यह संदेश देते हैं कि चाहे जीव कितना भी अपराधी क्यों न हो, जब वह भगवान की शरण में आता है तो प्रभु उसके पूर्व के सभी दोषों को भुलाकर उसे अपनाते हैं।
निष्कर्ष
इस दोहे में भगवान श्रीराम के शरणागत वत्सल स्वरूप का वर्णन है।
तुलसीदास जी यह समझाते हैं कि –
👉 अहंकार और पाप छोड़कर यदि कोई भी जीव सच्चे मन से प्रभु की शरण ग्रहण करता है, तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपा का पात्र बन जाता है।
👉 भगवान दंड देने में नहीं, बल्कि क्षमा और उद्धार करने में ही आनंदित होते हैं।
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