सुन्दर काण्ड चौपाई (213-221)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 213-221 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई:

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।

बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।

मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।

उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।

सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।

नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।

आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।

सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।

यह अंश सुन्दरकाण्ड का है, जहाँ रावण और हनुमानजी का संवाद हो रहा है।

आइए इसे क्रमवार समझते हैं –

चौपाई

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।

बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।

➡ यहाँ हनुमानजी ने रावण को बहुत ही हितकारी वचन कहे।

उनके वचनों में भगवद्भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीति की गहन शिक्षा थी।

परंतु रावण, जो अत्यंत अभिमानी और अहंकारी था, उपहास करते हुए बोला – “अरे! यह वानर तो बड़ा गुरु और ज्ञानी निकला।”

मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।

उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।

➡ रावण कहता है – “अरे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गई है, तभी तू मुझे उपदेश देने लगा।

तेरी वाणी से उलटा प्रभाव होगा, और तेरी मति का भ्रम मैं स्पष्ट पहचान गया।”

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।

सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।।

➡ हनुमानजी के वचन सुनकर रावण बहुत क्रोधित हुआ और आदेश दिया कि “इस मूर्ख वानर के प्राण तुरंत हर लो।”

तभी रावण के भाई विभीषण अपने मंत्रियों सहित आकर विनती करने लगे

नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।

आन दंड कछु करिअ गोसाईं। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।

➡ विभीषण ने नम्रता से कहा – “स्वामी! शास्त्र और नीति यह कहती है कि दूत को दंड देना चाहिए, परंतु मारना अनुचित है।

इसलिए इसे मारिए मत, कोई दूसरा दंड दीजिए।”

इस बात का समर्थन सबने किया।

सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।

➡ रावण हँसकर बोला – “ठीक है, इसे मारो मत, बल्कि इसका अंग-भंग करके लंका से बाहर निकाल दो।”

भावार्थ

इस प्रसंग में तीन मुख्य बातें स्पष्ट होती हैं –

1. हनुमानजी का उपदेश और रावण का अहंकार – हनुमान ने भक्ति, विवेक और वैराग्य का संदेश दिया, लेकिन रावण ने अहंकारवश उपहास किया।

2. विभीषण का नीति-सम्मत आचरण – विभीषण ने बताया कि दूत वध धर्म और नीति के विरुद्ध है, इसलिए कोई और दंड देना उचित होगा।

विस्तृत विवेचन

यह प्रसंग हमें यह शिक्षा देता है कि –

सद्बुद्धि और सन्मार्ग की बात केवल वही स्वीकार कर सकता है, जिसका हृदय विनम्र और अहंकाररहित हो। रावण का अंत उसका अहंकार ही करता है।

विभीषण के वचनों से यह सिद्ध होता है कि धर्म और नीति की रक्षा हर परिस्थिति में करनी चाहिए।

हनुमानजी यहाँ भगवान का संदेशवाहक बनकर धर्म और भक्ति का प्रचार करते हैं।

रावण का उपहास और क्रोध यह दर्शाता है कि मृत्यु समीप होने पर बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।

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