सुन्दर काण्ड दोहा ( 21)

 सुन्दर काण्ड दोहा 21 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।

तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।

भावार्थ

हे  लंकेश, जिन श्रीरामचन्द्रजी के अतुलनीय बल के सामने संपूर्ण चराचर जगत तिनके के समान तुच्छ हो जाता है, उन्हीं के दूत बनकर मैं आया हूँ। वे प्रभु आपको आदेश देते हैं कि उनकी प्रिय जानकीजी को यहाँ से मुक्त कर के मेरे साथ भेज दीजिए।

विस्तृत विवेचन

यह दोहा सुन्दरकाण्ड में उस समय आता है जब हनुमानजी लंका में रावण के दरबार में पहुँचकर संदेश सुना रहे हैं।

1. ‘जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि’ –

यहाँ ‘लवलेस’ का अर्थ है ‘अतुलनीय, जिसका कोई तोल-ताक नहीं’।

श्रीराम का बल इतना अपार और अद्वितीय है कि उनके सामने सारा सृष्टि-समूह (चराचर) मानो पत्तों या तिनकों की तरह उड़कर नष्ट हो जाता है।

यह प्रभु की महिमा का बखान और साथ ही रावण को चेतावनी है कि वह जिस शक्ति से उलझा है, वह कोई साधारण शक्ति नहीं।

2. ‘तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि’ –

हनुमानजी अपने को श्रीराम का दूत बताते हैं, जिससे स्पष्ट हो कि वे निजी लड़ाई नहीं लड़ रहे, बल्कि एक दिव्य आदेश का पालन कर रहे हैं।

"प्रिय नारि" — अर्थात माता सीता। हनुमानजी आग्रह कर रहे हैं कि प्रभु की पत्नी को तुरंत लौटा 

संक्षेप में, इस दोहे में हनुमानजी ने बड़े ही विनम्र लेकिन दृढ़ स्वर में रावण को श्रीराम की शक्ति का परिचय देते हुए अंतिम चेतावनी दी है—सीता माता को तुरंत छोड़ दो, अन्यथा परिणाम विनाशकारी होंगे।

इसमें स्पष्ट संदेश है: अगर आप सीता को लौटा देंगे, तो युद्ध और विनाश टल सकता है; अन्यथा श्रीराम का कोप अनिवार्य है।

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