सुन्दर काण्ड दोहा (20)

 सुन्दर काण्ड दोहा 20 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा

कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।

सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।

भावार्थ

जब रावण ने हनुमान को देखा तो पहले वह हँसा और अपमानजनक वचन कहे। लेकिन जैसे ही उसे अपने पुत्र अक्षय कुमार के वध की याद आई, उसके मन में क्रोध और दुःख दोनों उमड़ पड़े और वह मन ही मन विषाद (शोक) से भर गया।

विस्तृत विवेचन

इस दोहे में तुलसीदास जी ने रावण की मानसिक स्थिति का सूक्ष्म चित्रण किया है।

1. प्रारंभिक प्रतिक्रिया – अहंकार और उपहास

हनुमान को अपने दरबार में देखकर रावण पहले हँस पड़ा।

उसकी हँसी में अहंकार और तिरस्कार दोनों थे, क्योंकि वह हनुमान को "एक साधारण वानर" समझकर उसका अपमान कर रहा था।

"दुर्बाद" का अर्थ है कटु और अपमानजनक वचन, जो वह अपनी शक्ति और राक्षसी गर्व में बोल रहा था।

2. स्मृति का आघात – पुत्र-वियोग का विषाद

हँसी के कुछ ही क्षण बाद, उसे अपने वीर पुत्र अक्षय कुमार के वध की याद आ गई।

यह स्मृति उसके मन पर बिजली की तरह गिरी और उसका गर्व क्षण भर में विषाद (दुःख) में बदल गया।

यह परिवर्तन दिखाता है कि बाहरी कठोरता के पीछे भी रावण के भीतर मानवीय भावनाएँ मौजूद थीं।

संदेश – यह प्रसंग सिखाता है कि अहंकार और तिरस्कार में डूबा हुआ व्यक्ति भी दुःख और हानि के सामने असहाय हो जाता है। बाहरी ठाट-बाट और गर्व, हानि की पीड़ा के सामने टिक नहीं पाते।

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