सुन्दर काण्ड दोहा (19)
सुन्दर काण्ड दोहा 19 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा
"ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।"
भावार्थ
मेघनाद ने हनुमानजी पर ब्रह्मास्त्र छोड़ा। हनुमानजी ने मन ही मन विचार किया कि यदि मैं इस ब्रह्मास्त्र का अपमान करूँगा, तो ब्रह्मास्त्र की अपार महिमा नष्ट हो जाएगी। इसलिए उन्होंने उसकी आज्ञा मानते हुए अपने आपको बाँधने दिया।
विस्तृत विवेचन
सुन्दरकाण्ड के इस प्रसंग में, हनुमानजी अशोक वाटिका उजाड़कर, रावण के सैनिकों का संहार कर रहे थे। तब रावण के पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) ने उन्हें रोकने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।
ब्रह्मास्त्र की महत्ता – ब्रह्मा जी द्वारा दिया गया यह अस्त्र अति शक्तिशाली और दुर्लभ माना जाता है। इसका अपमान करना देवताओं का अपमान है।
हनुमानजी का निर्णय – वे जानते थे कि उनके बल और वीरता के सामने यह अस्त्र भी उन्हें स्थायी रूप से बाँध नहीं सकता। लेकिन उन्होंने यह सोचकर कि अगर वे इसका विरोध करेंगे तो इस दिव्य अस्त्र की प्रतिष्ठा नष्ट होगी, स्वेच्छा से उसे स्वीकार किया।
धार्मिक दृष्टिकोण – यह घटना हनुमानजी के विनय, धर्मपालन और नीति-बुद्धि का उदाहरण है। वे केवल पराक्रमी नहीं, बल्कि विवेकवान भी हैं। उन्होंने यहाँ युद्धनीति से अधिक धर्म की रक्षा को महत्व दिया।
अतः यह दोहा यह सिखाता है कि वास्तविक वीर वही है जो शक्ति का उपयोग संयम और धर्म के अनुरूप करे, न कि केवल विजय के लिए।
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