सुन्दर काण्ड दोहा (18)
सुन्दर काण्ड दोहा 18 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा –
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।१८।।
भावार्थ
हनुमानजी अशोक वाटिका के रक्षकों से युद्ध करते हैं।
कुछ रक्षकों को उन्होंने मार डाला,
कुछ को पैरों से कुचल दिया,
कुछ को धूल में लोटाकर घायल कर दिया,
और शेष बचे रक्षक भयभीत होकर रावण के पास जाकर पुकारने लगे कि “प्रभु! यह वानर अत्यंत बलवान है, इसे रोक पाना असंभव है।”
विस्तृत विवेचन
यह प्रसंग उस समय का है जब हनुमानजी अशोक वाटिका में सीता माता से भेंट कर चुके हैं और उनके द्वारा दिया हुआ आशीर्वाद व रामजी का संदेश अपने हृदय में संजोकर लौटने से पहले लंका में अपना पराक्रम दिखा रहे हैं।
1. वीरता और युद्ध कौशल –
हनुमानजी ने राक्षस रक्षकों पर अचानक आक्रमण किया। कुछ को गदा प्रहार से मार गिराया, कुछ को अपने विशाल पैरों से कुचल डाला, कुछ को पकड़कर जमीन पर पटक दिया, जिससे वे धूल में लथपथ हो गए। यह दृश्य हनुमानजी की अपार शारीरिक शक्ति और युद्ध-कुशलता का प्रमाण है।
2. भय और पराजय का माहौल –
जिन रक्षकों को हनुमानजी ने नहीं मारा, वे भयभीत होकर रावण के पास भागे और जोर-जोर से पुकारने लगे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह कोई साधारण वानर नहीं, बल्कि अपार बल वाला मर्कट है, जिसे रोकना कठिन है। इस प्रकार शत्रु के मन में आतंक भरना भी हनुमानजी की रणनीति का हिस्सा था।
3. संदेश –
यह प्रसंग दिखाता है कि धर्मरक्षा के लिए जब वीर उठ खड़ा होता है, तो उसके सामने असत्य की सेना टिक नहीं पाती। हनुमानजी का यह पराक्रम आने वाली लंका-दहन घटना की भूमिका भी तैयार करता है।
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