सुन्दर काण्ड चौपाई (178-185)
सुन्दर काण्ड चौपाई 178-185 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।
ये चौपाई सुंदरकाण्ड में उस प्रसंग को दर्शाती है जब हनुमानजी को ब्रह्मास्त्र से बाँधा गया और उन्हें रावण की सभा में ले जाया गया। चलिए इसे पहले भावार्थ और फिर विस्तृत विवेचन में समझते हैं—
भावार्थ
रावण के पुत्र ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर हनुमान को बाँध दिया, यद्यपि हनुमानजी के मन में भय या चिंता नहीं थी। वह नागपाश में बंधे हुए रावण की सभा में पहुँचे। यह देख राक्षस कौतुक से भरकर सभा में इकट्ठे हो गए। हनुमानजी के तेज और प्रभा को देखकर सभी राक्षस विस्मित हो गए, परंतु हनुमानजी के मन में तनिक भी संशय या डर नहीं था, जैसे गरुड़ को सर्पों से भय नहीं होता।
विस्तृत विवेचन
1. ब्रह्मास्त्र से बाँधना
"ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा" — मेघनाद ने हनुमानजी पर ब्रह्मास्त्र छोड़ा।
ब्रह्मास्त्र से बंध जाने पर भी, हनुमानजी ने रामकाज की नीति के अनुसार शांति रखी।
"परतिहुँ बार कटकु संघारा" — बंधे होने पर भी उनके प्रभाव से शत्रु-सैनिक बार-बार मारे जाते थे, जो यह दिखाता है कि उनका बल कम नहीं हुआ।
2. राम-भक्ति और निर्भयता
"जासु नाम जपि सुनहु भवानी" — तुलसीदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य ज्ञानपूर्वक राम का नाम जपता है, वह संसार-बन्धन काट देता है।
हनुमानजी तो स्वयं उस प्रभु के दूत थे, अतः नागपाश जैसे बन्धन उनका क्या कर सकते थे?
"जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका" — जैसे गरुड़ को सर्पों से भय नहीं होता, वैसे ही हनुमानजी को राक्षसों से भय नहीं था।
3. रावण की सभा में प्रवेश
राक्षसों ने हनुमान को रावण के सामने ले जाकर उपस्थित किया।
सभा में उनके तेज, ओज और प्रभा को देखकर सब चकित हो गए—"कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई"।
हनुमानजी ने हाथ जोड़कर सबको प्रणाम किया, परंतु उनकी आँखों में निर्भीकता और प्रभुत्व स्पष्ट था।
4. अंतर्निहित शिक्षा
सच्चे भक्त को किसी भी संकट में भय नहीं होता, क्योंकि उसे अपने ईश्वर पर पूर्ण विश्वास होता है।
बंधन केवल देह को बाँध सकता है, आत्मा को नहीं।
धर्म के कार्य में साहस और विनम्रता—दोनों का
होना आवश्यक है, जैसा हनुमानजी ने प्रदर्शित किया।
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