सुन्दर काण्ड चौपाई (169-177)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 169-177 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।

मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।

चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।

कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।

अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।

रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।

मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।

उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।

इन चौपाइयों में सुंदरकाण्ड की वह घटना वर्णित है जब लक्ष्मण के वध का समाचार सुनकर रावण का पुत्र मेघनाद (इन्द्रजीत) हनुमान जी से युद्ध करने आता है। यहाँ भावार्थ और विस्तृत विवेचन इस प्रकार है—

भावार्थ

हनुमान जी द्वारा रावण के पुत्र अक्षयकुमार के वध का समाचार सुनकर रावण क्रोधित हो गया और उसने अपने बड़े बलवान पुत्र मेघनाद को भेजा। उसने आदेश दिया — “उसे मारना मत, बल्कि बाँधकर लाना, ताकि देखें यह वानर कौन है और इसका क्या उद्देश्य है।”

इन्द्रजीत, जो अद्वितीय योद्धा था, भाई के वध की बात सुनकर अत्यंत क्रोधित हो गया और युद्ध के लिए चला।

हनुमान जी ने उसे आते देखा। वह दाँत पीसता, गर्जना करता और वेग से धावा बोलता आया।

हनुमान जी ने एक विशाल वृक्ष उखाड़कर इन्द्रजीत के रथ को निष्फल कर दिया।

फिर उसके साथ आए महाबली योद्धाओं को पकड़-पकड़कर अपने बल से मार गिराया।

इन्द्रजीत और हनुमान जी आमने-सामने ऐसे भिड़ गए मानो दो गजराज आमने-सामने हों।

हनुमान जी ने एक घूँसा मारकर इन्द्रजीत को मूर्छित कर दिया, पर वह उठकर पुनः मायावी युद्ध करने लगा।

हनुमान जी का पराक्रम देखकर वह समझ गया कि इन्हें मारना आसान नहीं, इसलिए योजना बदलकर उसने उन्हें बाँधने की सोची।

विस्तृत विवेचन

1. मेघनाद का आगमन –

अक्षयकुमार की मृत्यु से रावण क्रोधित तो था, पर उसने हनुमान को जीवित पकड़ने की योजना बनाई।

इससे उसकी मंशा स्पष्ट होती है — वह हनुमान से उनके उद्देश्य और राम के संदेश को जानना चाहता था, साथ ही अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना भी।

2. हनुमान का पराक्रम –

इन्द्रजीत के आगमन पर हनुमान जी भयभीत नहीं हुए, बल्कि उत्साहपूर्वक उसका सामना किया।

विशाल वृक्ष को हथियार की तरह प्रयोग करना वानर-बल और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का उदाहरण है।

इन्द्रजीत के साथ आमने-सामने युद्ध का वर्णन "जुगल मानहुँ गजराजा" उपमा से हुआ है, जो उनकी बराबरी के बल को दर्शाता है।

3. मायावी युद्ध –

इन्द्रजीत युद्ध में माया और जादुई अस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था।

मूर्छित होने के बाद भी उसने अपनी चतुराई से युद्ध की दिशा बदली।

यह प्रसंग दिखाता है कि राक्षस बल के साथ-साथ छल और माया का भी सहारा लेते थे।

4. कथा का महत्व –

यहाँ हनुमान जी का अद्भुत शौर्य और अपराजेय शक्ति प्रदर्शित होती है।

साथ ही, यह प्रसंग आने वाले "ब्रह्मास्त्र-बन्ध" की भूमिका बनाता है, जिससे हनुमान जी स्वेच्छा से बंध जाते हैं ताकि रावण से भेंट हो सके।

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