सुन्दर काण्ड चौपाई (161-168)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 161-168 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।

रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।

नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।

खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।

सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।

सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।

आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।

यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में उस प्रसंग का वर्णन करती है जब हनुमानजी अशोक वाटिका में सीताजी से भेंट कर लौटने से पहले लंका में रावण की सेना को अपना पराक्रम दिखाते हैं। 

भावार्थ

हनुमानजी ने सीताजी से विदा लेकर सिर नवाया और अशोक वाटिका में लौट आए। वहाँ उन्होंने वृक्षों के फल खाए और कई वृक्ष तोड़ डाले।

वहाँ बहुत से राक्षस-रक्षक थे — हनुमानजी ने कुछ को मार डाला, कुछ भागकर पुकारने लगे।

यह समाचार पाकर रावण ने एक बलवान कपि-रूप जैसा विशाल योद्धा भेजा जिसने अशोक वाटिका को उजाड़ डाला (यह यहाँ हनुमानजी का वर्णन है)। हनुमानजी ने फल खाए, वृक्ष उखाड़ डाले, और रक्षकों को मारकर भूमि पर पटक दिया।

रावण ने यह सुनकर अनेक योद्धा भेजे, पर हनुमानजी ने सबका वध कर दिया। कुछ बचकर भागे और रावण से जा मिले।

फिर रावण ने अपने पुत्र अक्षयकुमार को असीम बलवान योद्धाओं के साथ भेजा। जब वह आने लगा तो हनुमानजी ने एक वृक्ष पकड़कर उसे धमकाया, और प्रचंड गर्जना करते हुए उसे मार गिराया।

विस्तृत विवेचन

1. सीता से विदा और अशोक वाटिका में लीला

हनुमानजी, सीताजी को आश्वस्त कर, उन्हें रामजी का संदेश देकर सिर झुकाकर विदा लेते हैं। लौटते समय वे अशोक वाटिका में अपनी वीरता दिखाने लगते हैं — फल तोड़कर खाना, वृक्ष उखाड़ना और वाटिका को अस्त-व्यस्त करना — यह सब उन्होंने जानबूझकर किया ताकि रावण की सेना से सामना हो और वे रामदूत के रूप में अपना पराक्रम प्रदर्शित कर सकें।

2. रावण के रक्षकों से युद्ध

वहाँ मौजूद राक्षसी-रक्षक क्रोधित होकर हनुमानजी पर टूट पड़े, पर हनुमानजी ने उन्हें आसानी से मार गिराया। जो बचे, वे भागकर रावण के पास समाचार ले गए।

यह सुनकर रावण ने पहले साधारण योद्धा भेजे, फिर भी वे सब मारे गए। अंततः उसने अपने वीर पुत्र अक्षयकुमार को भेजा, जो अत्यंत बलवान था।

हनुमानजी ने उसका भी अंत कर दिया — यह दिखाते हुए कि चाहे कितना भी बड़ा योद्धा क्यों न हो, प्रभु-भक्ति और अद्वितीय बल से उसे परास्त किया जा सकता है।

संदेश — इस प्रसंग में हनुमानजी की वीरता, निर्भीकता और प्रभु-भक्ति का अद्भुत संगम दिखता है। वे शत्रु-भूमि में अकेले होते हुए भी किसी भय या संकोच से मुक्त हैं, क्योंकि उन्हें अपने प्रभु का सहारा है।

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