सुन्दर काण्ड दोहा (15)
सुन्दर काण्ड दोहा 15 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा:
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।
शब्दार्थ:
निसिचर – राक्षस
निकर – समूह
पतंग सम – पतंगों की तरह
कृसानु – अग्नि
धीर धरु – धैर्य रखो
जरे – जल जाएँ
जानु – निश्चय जानो
भावार्थ:
हनुमान जी सीता माता को आश्वस्त करते हुए कहते हैं —
हे माता! आप धैर्य रखिए। जैसे पतंगें अग्नि में गिरकर जल जाती हैं, वैसे ही रघुपति श्रीराम के बाण राक्षसों के समूह को भस्म कर देंगे। यह निश्चित मानिए कि राक्षस जलकर नष्ट हो जाएँगे।
विस्तृत विवेचन:
यह दोहा उस समय का है जब हनुमान जी सीता जी को रामजी का संदेश सुनाते हैं और उन्हें आश्वासन देते हैं। वे सीता जी के मन में राम के पराक्रम और शक्ति का विश्वास जागृत करते हैं।
हनुमान जी राक्षसों को पतंग के समान बताते हैं — जो अपने प्राण खोकर अग्नि में समा जाते हैं। यहाँ "रघुपति बान कृसानु" का अर्थ है राम के बाण अग्नि के समान प्रचंड हैं। राम के बाणों से राक्षसों का संहार होना निश्चित है।
इस दोहे के द्वारा हनुमान जी सीता जी को यह भरोसा दिलाते हैं कि रामजी के पास पहुँचते ही वे रावण और उसके समस्त राक्षसों को समाप्त कर देंगे। इस आश्वासन से सीता जी को मानसिक बल मिलता है।
नैतिक सन्देश:
भगवान के प्रति विश्वास अडिग होना चाहिए।
संकट के समय धैर्य और भरोसे से ही मनोबल
बना रहता है।
सच्चाई और धर्म की जीत सुनिश्चित है।
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