सुन्दर काण्ड चौपाई (143-151)
सुन्दर काण्ड चौपाई 143-151 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
शब्दार्थ (मुख्य शब्दों का अर्थ)
रघुबीर = श्रीराम
सुधि = स्मरण / सूचना
बरूथ = समूह / सेना
जातुधान = राक्षस
अबहिं = अभी
राम दोहाई = राम की शपथ
निसिचर = रात्रिचर (राक्षस)
कनक भूधराकार = स्वर्ण पर्वत के समान शरीर
भावार्थ
हनुमानजी सीता माता को सांत्वना देते हुए कहते हैं –
यदि रघुवीर श्रीराम को आपकी स्थिति का पता चल गया होता तो वे बिना विलंब किए तुरंत आपको बचाने आ जाते। उनके बाण सूर्य के समान प्रज्वलित हैं जो राक्षसों की अंधकारमयी सेना को नष्ट कर सकते हैं।
हनुमानजी आगे कहते हैं कि –
"माता! अभी मैं आपको ले चलूं ऐसा मेरा मन करता है, लेकिन प्रभु श्रीराम की आज्ञा नहीं है और मैं राम की शपथ खाता हूं कि बिना आज्ञा के कोई कार्य नहीं कर सकता।"
आप कुछ दिन धैर्य रखें, रघुवीर श्रीराम समस्त वानर वीरों के साथ आकर राक्षसों का संहार करेंगे और आपको साथ ले जाएंगे। तब तीनों लोकों में आपकी कीर्ति फैलेगी।
हनुमान जी बताते हैं कि श्रीराम के सभी वानर योद्धा मेरे ही समान बलशाली हैं, लेकिन रावण की सेना में भी बहुत बलवान योद्धा हैं, इसलिए थोड़ा संदेह स्वाभाविक है।
यह सुनकर हनुमान जी ने अपनी असली विशाल और तेजस्वी रूप में झलक दी — वह स्वर्ण पर्वत के समान दीप्तिमान, युद्ध में भयंकर, महान बलवान वीर प्रतीत हुए।
यह देख सीता माता के मन में विश्वास उत्पन्न हुआ। फिर हनुमानजी ने पुनः अपना छोटा रूप धारण कर लिया।
विवेचन
इस चौपाई समूह में हनुमानजी की भक्ति, विनम्रता, कर्तव्यनिष्ठा और आत्मविश्वास झलकता है। वे न सिर्फ सीता माता को आश्वासन देते हैं, बल्कि रामभक्त होने के कारण अनुशासन और आज्ञापालन का सुंदर आदर्श भी प्रस्तुत करते हैं।
यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि—
1. धैर्य और विश्वास संकट में सबसे बड़ी शक्ति होती है।
2. कर्तव्य पालन में भावना से ऊपर नियम होता है — जैसे हनुमान जी श्रीराम की आज्ञा के बिना सीता को नहीं ले जाते।
यह चौपाई श्रीराम और हनुमान के परस्पर विश्वास और मर्यादा का भी प्रतीक है।
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