सुन्दर काण्ड दोहा (14)

 सुन्दर काण्ड दोहा 14 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा

"रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।

अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।"

शब्दार्थ

रघुपति – श्रीराम

संदेसु – संदेश

जननी – माता (यहाँ सीता जी)

धरि धीर – धैर्य धारण कर

गद गद – भावुक होकर

बिलोचन नीर – आंखों का जल (आंसू)

भावार्थ

हनुमान जी कहते हैं – "हे जननी! अब रघुपति श्रीराम का संदेश सुनिए और धैर्य रखिए।"

इतना कहकर वे भावविभोर हो गए, उनका गला रुंध गया और आंखों से आंसू भर आए।

विस्तृतविवेचन

इस दोहे में हनुमान जी की भावुकता और सीता माता के प्रति प्रेम और करुणा झलकती है। वे श्रीराम का संदेश सुनाने जा रहे हैं, लेकिन माता की दुःखद स्थिति देखकर उनका मन भर आता है।

वे माता से पहले धैर्य रखने को कहते हैं, ताकि वह संदेश सुनने में समर्थ हो सकें। स्वयं हनुमान जी भी उस क्षण में गदगद हो उठते हैं, उनका गला रुँध जाता है और नेत्रों में जल भर आता है।

यह दृश्य हनुमान जी की करुणामय भावना, राम के प्रति भक्ति, और सीता जी के प्रति सेवा भाव को प्रकट करता है। यह दोहा सुंदरकांड की मानवीय संवेदना और निष्ठा-भावना को चरम पर पहुंचा देता है।

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