सुन्दर काण्ड चौपाई (133-142)
सुन्दर काण्ड चौपाई 133-142 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
भावार्थ:
हनुमानजी माता सीता से कहते हैं कि हे माता! श्रीराम के वियोग में तुम्हारा दुख जानकर मेरे लिए सारा जगत विपरीत हो गया है। हर सुंदर वस्तु भी अब दुखद प्रतीत होती है।
नव पत्ते (कोमल किसलय) भी अग्नि जैसे लगते हैं, चाँद और सूरज की रातें भी अब अंधेरी और डरावनी लगती हैं। सुंदर कुमुद फूलों का वन भी अब कांटों से भरा लगता है। शीतल जलवर्षा भी गर्म तेल सी प्रतीत होती है।
जो पहले सुखद और हितकारी लगते थे, वही अब कष्टदायक हो गए हैं। तीनों प्रकार की वायु (शीत, ग्रीष्म, वर्षा) अब साँप की साँस के समान विषैली लगती हैं।
हनुमानजी कहते हैं कि कुछ कह देने से शायद दुख थोड़ा कम हो जाए, पर मैं क्या कहूं? इस दुख को कोई जान ही नहीं सकता।
फिर वे माता सीता को आश्वस्त करते हुए कहते हैं – हे माता! तुम्हारा और प्रभु श्रीराम का प्रेम अत्यंत गहन और सच्चा है। प्रभु का मन एकमात्र तुम्हारे साथ ही रहता है – इससे ही उनके प्रेम की गहराई समझो।
जब सीता जी श्रीराम का संदेश सुनती हैं, तो वे प्रेम में इतना डूब जाती हैं कि अपने तन की सुध-बुध तक खो बैठती हैं।
अंत में हनुमानजी उन्हें धैर्य बंधाते हुए कहते हैं – हे माता! राम का स्मरण करो, वे सेवकों को सुख देने वाले हैं। अपने हृदय में उनके ऐश्वर्य और प्रभुता को धारण करो, और मेरे वचनों को सुनकर अब दुख छोड़ दो।
विस्तृत विवेचन:
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में उस प्रसंग की है जब हनुमानजी अशोक वाटिका में सीता जी से मिलते हैं और श्रीराम का संदेश सुनाते हैं। इसमें प्रेम, करुणा, विश्वास और भक्ति की पराकाष्ठा झलकती है।
1. राम के वियोग का प्रभाव: सीता के वियोग से हनुमान जी को संसार की हर वस्तु पीड़ादायक प्रतीत होती है। यह प्रेम की सच्ची अनुभूति है, जिसमें आत्मा दूसरे की पीड़ा को अपना समझ लेती है।
2. प्रेम की गहराई: हनुमानजी बताते हैं कि श्रीराम का मन सदा सीता में ही रमता है, यह उनकी प्रेम की सच्चाई और अखंडता को दर्शाता है।
3. सीता की अवस्था: राम का संदेश सुनकर सीता इतनी भावविह्वल हो जाती हैं कि तन की सुध तक खो बैठती हैं। यह प्रेम की चरम स्थिति है – तन की सुध-बुध बिसरि जाय।
4. हनुमान की प्रेरणा: वे सीता को धैर्य रखने और प्रभु की प्रभुता को स्मरण करने का उपदेश देते हैं। यही सच्चा सेवक है – जो दुख में भी दूसरों को हिम्मत दे।
निष्कर्ष:
यह चौपाई दर्शाती है कि भक्त और भगवान का संबंध केवल भावनात्मक नहीं बल्कि आत्मिक और शाश्वत होता है। हनुमानजी का समर्पण, सीता की प्रेम-गहराई और श्रीराम की निष्कलंक भक्ति इस प्रसंग में उजागर होती है। यह भक्ति, प्रेम और धैर्य का श्रेष्ठतम उदाहरण है।
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