सुन्दर काण्ड (चौपाई 8)
सुन्दर काण्ड चौपाई 8 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।
एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
अनुवाद:
जिस प्रकार रघुपति (श्रीराम) का बाण अचूक (अमोघ) होता है,
उसी प्रकार हनुमान जी भी (अपने कार्य में) चल पड़े।
2. भावार्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी हनुमान जी के अद्भुत शक्ति और भक्ति को दर्शाते हैं।
“रघुपति कर बाना” अर्थात श्रीराम का बाण, जो कभी निष्फल नहीं होता, जिसका लक्ष्य सदैव सही होता है।
“जिमि अमोघ” यानी जैसे वह बाण अचूक होता है,
“एही भाँति चलेउ हनुमाना” अर्थात उसी प्रकार हनुमान जी भी अपने उद्देश्य की ओर अटल होकर आगे बढ़े।
इसका तात्पर्य यह है कि श्रीराम का आदेश और उनका बाण दोनों ही निष्फल नहीं होते, और जिस प्रकार श्रीराम का बाण अपने लक्ष्य को भेदता है, उसी प्रकार हनुमान जी भी श्रीराम के कार्य के लिए अडिग और अचूक निश्चय के साथ आगे बढ़ते हैं।
3. विस्तृत विवेचन
क. भक्ति और कर्तव्य की प्रतिबद्धता
हनुमान जी श्रीराम के परम भक्त हैं। उनके लिए श्रीराम का आदेश ही सर्वोपरि है। इस चौपाई में यह दर्शाया गया है कि हनुमान जी अपने कर्तव्य को उसी निष्ठा और सफलता से पूरा करते हैं, जिस प्रकार श्रीराम का बाण अपने लक्ष्य को भेदता है।
ख. अमोघता का प्रतीक
“अमोघ” शब्द का अर्थ है – जो कभी निष्फल न हो। श्रीराम के बाण की अमोघता से तात्पर्य है कि उनका कोई भी आदेश या कार्य व्यर्थ नहीं जाता। हनुमान जी भी अपने कार्य में उसी अमोघता का परिचय देते हैं।
ग. सुन्दरकाण्ड का संदर्भ
सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी सीता माता की खोज के लिए लंका की ओर प्रस्थान करते हैं। यह चौपाई उनके इसी प्रस्थान के समय की है। यहाँ हनुमान जी की अटलता, निर्भीकता और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाया गया है।
घ. आध्यात्मिक संदेश
इस चौपाई से आध्यात्मिक संदेश यह मिलता है कि जिस प्रकार श्रीराम का बाण अचूक होता है, उसी प्रकार यदि मनुष्य अपने कर्तव्य को पूर्ण निष्ठा और समर्पण से करे, तो उसका कार्य भी निष्फल नहीं होता।
4. सारांश
इस चौपाई में हनुमान जी की कर्तव्यनिष्ठा, श्रीराम के प्रति समर्पण और अचूकता को बहुत ही सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है। यह चौपाई हमें यह शिक्षा देती है कि अपने कर्तव्य को पूर्ण निष्ठा से करने पर सफलता अवश्य मिलती है।
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